बिलासपुर। ग्राम पंचायत दर्रीमाठा में उठे तीन अलग-अलग मुद्दों ने अब केवल पंचायत स्तर का विवाद नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास, शासकीय भूमि संरक्षण और सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनदर्शन में पहुंचे पंचायत के सरपंच एनल धृतलहरे ने कलेक्टर के समक्ष जो शिकायतें रखी हैं, वे प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली और सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल उस तालाब निर्माण कार्य को लेकर है, जिसे गांव में जल संकट दूर करने और मनरेगा मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्वीकृत किया गया था। ग्रामीणों की मांग पर स्वीकृत इस परियोजना को यदि वास्तव में रेशम पालन योजना के नाम पर रोक दिया गया है, तो यह केवल एक निर्माण कार्य रुकने का मामला नहीं है। यह उस प्राथमिकता पर भी सवाल है, जहां जल संरक्षण जैसे बुनियादी विषय और रोजगार सृजन के अवसर किसी अन्य योजना के सामने पीछे छूट गए। ग्रामीण इलाकों में तालाब केवल जल स्रोत नहीं होते, बल्कि खेती, पशुपालन और स्थानीय अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा माने जाते हैं। ऐसे में निर्माण कार्य बंद होना स्वाभाविक रूप से असंतोष को जन्म देता है।
दूसरा मुद्दा शासकीय भूमि पर कथित अवैध कब्जे का है। सरपंच का आरोप है कि लीलागर नदी किनारे लगभग तीन एकड़ सरकारी भूमि वर्षों से कब्जे में है और पंचनामा बनने के बावजूद प्रशासनिक कार्रवाई अधूरी है। यदि यह दावा सही है तो यह केवल जमीन का मामला नहीं, बल्कि राजस्व प्रशासन की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न है। ग्रामीण क्षेत्रों में गोचर भूमि लगातार सिमट रही है और पशुपालकों को चराई के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल पा रहा। ऐसे में सरकारी भूमि पर कब्जे की शिकायतों का वर्षों तक लंबित रहना प्रशासनिक उदासीनता की तस्वीर पेश करता है।
सबसे गंभीर आरोप रेशम पालन योजना को लेकर लगाए गए हैं। सरकारी योजनाओं का मूल उद्देश्य ग्रामीणों को आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना और स्थानीय विकास को गति देना होता है। लेकिन यदि किसी योजना में सरकारी धन के दुरुपयोग, राशि के संदिग्ध हस्तांतरण और लाखों रुपये के कथित बंदरबांट जैसे आरोप सामने आते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि जनविश्वास से जुड़ा विषय बन जाता है। सरपंच द्वारा पांच से छह वर्षों के वित्तीय लेन-देन की जांच की मांग यह संकेत देती है कि मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि आर्थिक जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है।
दर्रीमाठा का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां तीनों मुद्दों का केंद्र एक ही है—सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग किसके हित में और किस पारदर्शिता के साथ हो रहा है? एक ओर तालाब निर्माण रुका हुआ है, दूसरी ओर सरकारी जमीन पर कब्जे के आरोप हैं और तीसरी तरफ सरकारी योजना में वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें सामने हैं। यह संयोग नहीं बल्कि ऐसी परिस्थितियां हैं, जो प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
हालांकि शिकायतें सरपंच द्वारा प्रस्तुत की गई हैं और आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। लेकिन इतना तय है कि जनदर्शन तक पहुंचे इस मामले ने कई संवेदनशील प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अब जिला प्रशासन के सामने चुनौती केवल शिकायतों का निराकरण करने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की भी है कि सरकारी योजनाएं, शासकीय भूमि और विकास कार्य वास्तव में जनता के हित में संचालित हो रहे हैं।
यदि जांच निष्पक्ष और तथ्यात्मक आधार पर होती है तो दर्रीमाठा का यह विवाद केवल एक पंचायत का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पूरे जिले में सरकारी योजनाओं की निगरानी, शासकीय भूमि संरक्षण और विकास कार्यों की पारदर्शिता को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। फिलहाल गांव में चर्चा गर्म है और सबकी निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। सवाल यह है कि शिकायतों के पीछे सच्चाई कितनी है और जवाबदेही की कसौटी पर कौन खरा उतरता है।


