बिलासपुर। किसी व्यक्ति की जिंदगी की आखिरी सांसों से पहले दर्ज किए गए शब्द कई बार पूरे अपराध की तस्वीर बदल देते हैं। यही वजह है कि मृत्युकालीन कथन को न्यायिक प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है। इसी संवेदनशील और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण प्रक्रिया को लेकर सोमवार को बिलासपुर के मंथन सभा कक्ष में कार्यपालिक मजिस्ट्रेट, पुलिस अधिकारियों, लोक अभियोजकों और चिकित्सा अधिकारियों की विशेष प्रशिक्षण एवं कार्यशाला आयोजित की गई।
प्रशिक्षण में कलेक्टर संजय अग्रवाल और एसएसपी रजनेश सिंह मौजूद रहे। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य मृत्युकालीन कथन दर्ज करने की मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी का जमीन पर प्रभावी और बिना किसी चूक के पालन सुनिश्चित करना रहा।
कलेक्टर संजय अग्रवाल ने कहा कि किसी अपराध में आरोपी को सजा के मुकाम तक पहुंचाने में मृत्युकालीन कथन बेहद महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकता है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि कथन दर्ज करते समय सबसे अहम बात यह है कि पीड़ित व्यक्ति पूरी तरह होशो-हवास में हो और किसी भी तरह के दबाव, भय या प्रभाव में बयान न दे रहा हो। बयान की परिस्थितियां और उसकी वैधानिकता ही आगे न्यायालय में उसकी विश्वसनीयता तय करती हैं।
उन्होंने अधिकारियों से कहा कि अपराधी तक पहुंचना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जांच को इस स्तर तक मजबूत करना जरूरी है कि अदालत में भी साक्ष्य टिक सके। पुलिस, कार्यपालिक मजिस्ट्रेट, चिकित्सा अधिकारियों और अभियोजन के बीच बेहतर समन्वय से साक्ष्यों का संकलन किया जाए, ताकि दोषियों को कानून के मुताबिक सजा दिलाई जा सके।
एसएसपी रजनेश सिंह ने फील्ड की चुनौतियों पर दिया जोर
एसएसपी रजनेश सिंह ने अधिकारियों से कहा कि विवेचना के दौरान सामने आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों और अनुभवों को प्रशिक्षण में साझा किया जाए। उन्होंने निर्देशित किया कि मृत्युकालीन कथन सहित सभी महत्वपूर्ण साक्ष्यों के संकलन में निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया जाए। उनका जोर इस बात पर रहा कि जांच में छोटी-सी चूक भी गंभीर आपराधिक मामले को न्यायालय में कमजोर कर सकती है।
प्रशिक्षण के दौरान लोक अभियोजन अधिकारी वीणा सिंह और श्वेता कुर्रे ने मृत्युकालीन कथन लेखबद्ध करने से जुड़ी एसओपी की बारीकियों की विस्तार से जानकारी दी। अधिकारियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए कथन दर्ज करने की प्रक्रिया, आवश्यक सावधानियों और कानूनी पहलुओं पर चर्चा की गई।
आखिरी बयान में छिपा हो सकता है अपराध का पूरा सच
मृत्युकालीन कथन किसी घायल या गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति का महज बयान नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थिति में दर्ज किया गया कथन होता है, जहां उसके बाद न्यायालय में प्रत्यक्ष गवाही का अवसर संभव नहीं रह सकता। इसलिए इसे दर्ज करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता, स्वतंत्रता और कानूनी मानकों का पालन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
छत्तीसगढ़ शासन के गृह विभाग के निर्देश और उच्च न्यायालय, बिलासपुर द्वारा पारित आदेश के अनुपालन में आयोजित इस प्रशिक्षण का मकसद यही है कि ऐसे मामलों में प्रक्रिया की किसी भी कड़ी पर लापरवाही न हो और पीड़ित के अंतिम शब्द न्याय की राह में मजबूत साक्ष्य बन सकें।


