
डोमनलाल कोर्सेवाड़ा की पहचान महज एक राजनीतिक चेहरे तक सीमित नहीं थी। वे उन नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने राजनीति में आने से पहले समाज के बीच रहकर लोगों का विश्वास अर्जित किया। उनका जीवन इस बात की मिसाल रहा कि जनसेवा का रास्ता सत्ता और पद से नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी और समर्पण से निकलता है।
कोर्सेवाड़ा के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत जनवरी 1972 में सहायक शिक्षक के रूप में हुई थी। शिक्षा विभाग में करीब 34 वर्षों तक सेवाएं देते हुए उन्होंने विद्यार्थियों के भविष्य को दिशा देने का काम किया। शिक्षक के रूप में उनकी सादगी, व्यवहार और विद्यार्थियों के प्रति समर्पण ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। यही वजह थी कि राजनीति में आने के बाद भी लोग उन्हें विधायक से ज्यादा सम्मान के साथ ‘गुरुजी’ कहकर पुकारते रहे।
उनके व्यक्तित्व में शिक्षक का अनुशासन और समाजसेवक की संवेदनशीलता हमेशा दिखाई देती रही। वे मानते थे कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाने की बुनियाद है।
राजनीति में सक्रिय होने से पहले कोर्सेवाड़ा ने करीब 12 वर्षों तक पूर्व सांसद स्वर्गीय ताराचंद साहू के निज सहायक के रूप में काम किया। इस दौरान उन्हें आम लोगों की समस्याओं, ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतों और राजनीतिक व्यवस्था को करीब से समझने का अवसर मिला। ताराचंद साहू के मार्गदर्शन ने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके बाद उन्होंने शासकीय सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर भारतीय जनता पार्टी के साथ सक्रिय राजनीति में कदम रखा। उनका राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा, लेकिन उन्होंने संगठन के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी।
वर्ष 2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई अहिवारा विधानसभा सीट से भाजपा ने पहली बार डोमनलाल कोर्सेवाड़ा को मैदान में उतारा। उन्होंने जीत हासिल कर नवगठित विधानसभा क्षेत्र के पहले विधायक बनने का गौरव प्राप्त किया।
हालांकि, 2013 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उनका टिकट काटकर सांवलाराम डाहरे को प्रत्याशी बनाया। वर्ष 2018 में भी भाजपा ने डाहरे पर भरोसा जताया। राजनीतिक परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं रहीं, लेकिन कोर्सेवाड़ा ने पार्टी के फैसले के खिलाफ बगावत का रास्ता नहीं चुना। वे संगठन से जुड़े रहे और क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के बीच अपनी सक्रियता बनाए रखी।
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताया। इस बार उन्होंने जीत दर्ज कर विधानसभा में वापसी की। यह जीत उनके राजनीतिक धैर्य और क्षेत्र में कायम जनसंपर्क का प्रमाण मानी गई।
विधायक के रूप में कोर्सेवाड़ा ने अहिवारा क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार को प्राथमिकता दी। उनके कार्यकाल में 451 करोड़ रुपये से अधिक के विकास कार्य स्वीकृत होने की जानकारी सामने आई। इनमें से अधिकांश कार्य पूरे होने का दावा किया गया। नंदनी में केंद्रीय विद्यालय की स्थापना के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजना भी उनकी प्रमुख पहलों में शामिल रहा। उनका प्रयास था कि क्षेत्र के बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए दूसरे शहरों की ओर न देखना पड़े।
राज्य सरकार ने उनके अनुभव और राजनीतिक भूमिका को देखते हुए उन्हें अनुसूचित जाति विकास प्राधिकरण का उपाध्यक्ष बनाया था। इस पद पर उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त था।
डोमनलाल कोर्सेवाड़ा का योगदान केवल राजनीतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों उन्हें गुरु घासीदास सम्मान से सम्मानित किया गया था। वर्ष 2013 में उन्हें श्रेष्ठ विधायक पुरस्कार भी मिला। इन सम्मानों के बावजूद उनके व्यवहार में कभी पद और प्रतिष्ठा का अहंकार दिखाई नहीं दिया। वे अपनी उपलब्धियों का श्रेय क्षेत्र की जनता, पार्टी कार्यकर्ताओं और अपने राजनीतिक मार्गदर्शकों को देते थे।
राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त कोर्सेवाड़ा का परिवार भी शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ा रहा। उनकी पत्नी कमला कोर्सेवाड़ा दुर्ग जिला मंडी की अध्यक्ष रह चुकी हैं। बेटे धनंजय कोर्सेवाड़ा गुंडरदेही जनपद पंचायत के सदस्य रहे। परिवार के अन्य सदस्य भी अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहे हैं।
डोमनलाल कोर्सेवाड़ा के निधन से अहिवारा ने अपना जनप्रतिनिधि खो दिया, भाजपा ने अपना वरिष्ठ नेता खो दिया और क्षेत्र के हजारों लोगों ने वह चेहरा खो दिया, जिसे वे सम्मान से गुरुजी कहते थे।
उनकी राजनीतिक यात्रा में उतार-चढ़ाव आए, टिकट कटा, इंतजार करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने व्यवहार और संगठनात्मक निष्ठा से अपनी जगह बनाए रखी। शिक्षक से विधायक तक का उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि समाज के बीच अर्जित सम्मान किसी पद का मोहताज नहीं होता।
आज उनके जाने के बाद अहिवारा की राजनीति में एक रिक्तता पैदा हो गई है, लेकिन 34 वर्षों की शिक्षकीय सेवा, जनसंपर्क, विकास के प्रयास और सहज व्यक्तित्व की यादें लंबे समय तक लोगों के बीच जीवित रहेंगी। डोमनलाल कोर्सेवाड़ा का जीवन भले ही थम गया हो, लेकिन ‘गुरुजी’ के रूप में उन्होंने जो पहचान बनाई, वह अहिवारा की स्मृतियों में हमेशा बनी रहेगी।

