Thursday, March 12, 2026
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हिमाचल के डॉक्टर उमेश भारती ने खोजा रैबीज का सस्ता इलाज तो मिला पद्मश्री सम्मान…

हिमाचल के डॉक्टर उमेश भारती को प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जाएगा। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर शुक्रवार को भारत सरकार ने पद्म पुरस्कारों का एलान किया। डॉक्टर भारती को चिकित्सा के क्षेत्र में रैबीज का सस्ता इलाज खोजने पर इस पुरस्कार के लिए चुना गया।

डॉक्टर भारती के शोध से पागल कुत्ते व बंदर के काटने पर मरीजों का 30 से 35 हजार के बीच होने वाला महंगा इलाज मात्र 350 रुपये में संभव हो पाया है।

कांगड़ा जिला के ज्वालामुखी में जन्मे डॉक्टर उमेश भारती (50) वर्तमान में स्टेट एपीडिमियोलॉजिस्ट के पद पर शिमला में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने लगभग डेढ़ दशक के शोध से यह साबित किया कि रैबीज इम्युनोग्लोबुलिन सीरम को पागल कुत्ते या बन्दर के काटने से होने वाले घाव पर लगाया जाए तो असर जल्दी होता है| साथ ही दवा की मात्रा भी कम लगती है।

डॉ. भारती तकरीबन 17 सालों से इस पर मेहनत कर रहे थे और बेंगलुरु के निमहांस (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हैल्थ एंड न्यूरोसाइंस) से उनके शोध को तकनीकी स्वीकृति मिलने पर इस पद्धति का इस्तेमाल देश के सभी राज्यों में पागल कुत्तों, बंदरों व अन्य जानवरों के काटने पर इलाज के लिए हो रहा है| इससे रेबीज के इलाज की लागत 35 हजार रुपये से घट कर मात्र 350 रुपये रह गई है।

अहम बात यह रही कि डॉक्टर भारती के शोध को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा विगत वर्ष मान्यता प्राप्त होने के बाद अब इसे पूरे विश्व में अपनाया जा रहा है।

दरअसल रैबीज इम्युनोग्लोबुलिन सीरम घोड़े अथवा इन्सान के खून से बनता है| इसको बनाने की प्रक्रिया भी बहुत जटिल होती है। महंगा होने के कारण कुछ चुनिंदा अस्पताल ही इसे आवश्यक मात्रा में खरीद पाते थे। कई बार एक ही मरीज में इतना सीरम लगा दिया जाता था कि बाकी मरीजों के लिए बच नहीं पाता था। महंगा होने पर जो लोग इसकी कीमत नहीं चुका पाते थे, वे मौत की भेंट चढ़ जाते थे।

दिलचस्प यह है कि पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित होने वाले डॉक्टर भारती को यह सम्मान बिना नामांकन भरे ही मिला है। डॉक्टर उमेश भारती ने इस सम्मान पर खुशी जताते हुए कहा कि अच्छे काम के बदले सम्मान पाने के लिए आवेदन कोई अहर्ता नहीं है।

आंकड़ों पर गौर करें तो पूरे विश्व में प्रत्येक वर्ष रेबीज से करीब 59 हजार लोगों की मौत हो जाती है। भारत में करीब 20 हजार लोग रेबीज से अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं।

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