Wednesday, April 29, 2026
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छत्तीसगढ़ / सरगुजा संभाग के बाद दंतेवाड़ा में जीत से बस्तर की सभी 12 सीटों पर कांग्रेस काबिज

जगदलपुर . दंतेवाड़ा उपचुनाव की बाजी कांग्रेस ने जीत ली है। देवती कर्मा की 11331 वोटों की जीत के साथ बस्तर की सभी 12 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का कब्जा हो गया है। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद यह पहला ऐसा मौका है जब बस्तर की सभी विधानसभा सीटों पर किसी एक पार्टी का कब्जा रहा हो। राज्य गठन के तुरंत बाद हुए चुनावों में भी ऐसी स्थिति कभी नहीं रही। प्रदेश में सरगुजा के बाद अब बस्तर दूसरा ऐसा संभाग है जहां से भाजपा की एक भी विधानसभा सीट नहीं है।

2018 के विधानसभा चुनाव में दंतेवाड़ा ही एक ऐसी सीट थी जहां से भाजपा के भीमा मंडावी ने चुनाव जीता था। उन्होंने देवती कर्मा को 2172 वोटों से हराया था। भीमा चार महीने ही विधायक के तौर पर काम किए थे, 9 अप्रैल को लोकसभा चुनाव से कुछ घंटे पहले उनकी हत्या कर दी गई थी। विधानसभा चुनाव के नतीजों के 9 महीने बाद हुए उपचुनाव में एक बार फिर से यह सीट कांग्रेस के पास आ गई है। शुक्रवार की सुबह शुरू हुई मतगणना में पहले ही राउंड से कांग्रेस की देवती ने बढ़त बनाई हुई थी। 20 राउंड की मतगणना में 15 राउंड में देवती ने लीड किया तो सिर्फ पांच राउंड में ही ओजस्वी लीड कर पाईं, लेकिन सभी राउंड में देवती ही आगे रहीं।

चुनाव जीतने के तत्काल बाद देवती कर्मा ने इसे कार्यकर्ताओं की जीत बताया। उन्होंने कहा कि इस चुनाव में सभी कार्यकर्ता एकजुट रहे और सबने पार्टी को मिलकर जीत दिलाई है। उपचुनाव में कुल नौ प्रत्याशी मैदान में थे। इनमें से सात प्रत्याशी जमानत तक नहीं बचा पाए और सीपीआई को छोड़ जनता कांग्रेस, आप जैसी पार्टियों के प्रत्याशियों को तो नोटा से भी कम वोट मिले हैं।

दंतेवाड़ा की जीत का जश्न, रायपुर कांग्रेस भवन में बंटीं मिठाइयां : दंतेवाडा उपचुनाव जीत का जश्न कांग्रेस भवन गांधी मैदान में मनाया गया। कांग्रेस प्रत्याशी देवती कर्मा की जीत की खुशी में कांग्रेस भवन में मिठाइयां बांटी गईं व फटाके फोड़ कर ढोल बाजे के साथ कांग्रेसी झूमते नजर आए। शहर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गिरीश दुबे ने कहा कि इस ऐतिहासिक जीत का श्रेय मुख्यमंत्री भूपेश बघेल व प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम को जाता है। महापौर प्रमोद दुबे ने इस जीत को कार्यकर्ताओं की जीत बताया। इस दौरान पीयूष कोसरे, मो फहीम, बंशी कन्नौजे, शब्बीर, खान सुनिता शर्मा, सुनिल भुवाल प्रशांत ठेेंगडी आदि उपस्थित थे।

छत्तीसगढ़ बनने के बाद कांग्रेस की सबसे बड़ी जीत : कांग्रेस की देवती कर्मा दंतेवाड़ा उपचुनाव जीत गई। यह चुनाव कांग्रेस के लिए कई मायनों में रिकार्ड कायम करने वाला रहा। राज्य स्थापना के बाद दंतेवाड़ा विधानसभा के लिए पांच बार चुनाव आयोजित हुए। इनमें चार चुनाव तय समय पर हुए तो पांचवां चुनाव दंतेवाड़ा के विधायक भीमा मंडावी की हत्या के बाद उपचुनाव के तौर पर हुआ और इसी पांचवें चुनाव में देवती ने कांग्रेस के जीत के सारे रिकार्ड तोड़े हैं। अब तक दंतेवाड़ा में जो भी चुनाव हुए उनमें कांटे के मुकाबले के बाद प्रत्याशी बहुत कम मार्जिन से चुनाव जीतते रहे हैं, लेकिन यह चुनाव देवती ने करीब 11331 वोटों से जीता है। इसके अलावा खास बात यह है कि अब तक हुए चुनाव में सबसे ज्यादा 49979 वोट देवती को ही मिले।

बस्तर ने शांति बहाली और खुशहाली  का स्वागत किया :  रायपुर | जीत पर प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा कि बस्तर में शांति की बहाली और खुशहाली का जनता ने स्वागत किया। यह भूपेश बघेल सरकार के सकारात्मक कार्यों और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मेहनत की जीत है। त्रिवेदी ने कहा कि मोहन मरकाम के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद यह पहला चुनाव है। चुनाव घोषणा के पहले से मरकाम ने दंतेवाड़ा के बूथ अध्यक्षों की बैठकें लीं और चुनाव के अंत तक कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत की।

मरकाम बोले- 8 महीने के काम को जनता ने सराहा : इधर चुनाव जीतने के तत्काल बाद पीसीसी चीफ मोहन मरकाम ने कहा कि हम सब ने मिलकर चुनाव लड़ा था। भूपेश बघेल की सरकार ने आठ महीने में जो काम किया उसका फायदा आम जनता को मिल रहा है, कांग्रेस की नीतियां भी जनता को पसंद आ रही है। यह उसका ही नतीजा है कि इतनी बड़ी जीत हमें मिली है।

भाजपा को अपनी हार से ज्यादा कांग्रेस की जीत की चिंता करनी चाहिए 

दं तेवाड़ा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी को अपनी हार से ज्यादा कांग्रेस की जीत का मंथन करना चाहिए। एेसा इसलिए कि कांग्रेस ने यह उपचुनाव उनके पक्ष में माहौल नहीं होने के बावजूद विशुद्ध रूप से रणनीतिक कौशल से जीता है। कांग्रेस के लिए एेसा माना जाता है कि वह राजनीतिक जोड़-तोड़, प्रचार प्रपंचों, बूथ मैनेजमेंट और नेताओं, कार्यकर्ताओं के अनुशासन में कमजोर है। उसके मुकाबले भाजपा इसमें ज्यादा कुशल है।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद के पहले तीन चुनाव देखिए इसमें कांग्रेस की हार का कारण आपसी कलह था और भाजपा की जीत का कारण बेहतर चुनाव मैनेजमेंट। 2018 में कांग्रेस को जो प्रचंड बहुमत मिला उसका कारण सत्ता विरोधी लहर थी। आशय यह कि चुनाव लड़ना कांग्रेस ठीक से नहीं जानती थी। विरोधी भी यही सोचते रहे कि छत्तीसगढ़ कांग्रेस को फिलहाल इलेक्शन मैनेजमेंट सीखना है, लेकिन उन्हें नहीं मालूम था, कि कांग्रेस की नई टीम ने अपनी इस कमी को ना सिर्फ पहचान लिया है, उसे दूर भी कर लिया है।

अब दंतेवाड़ा चुनाव में कांग्रेस का अनुशासन और सटीक राजनीतिक बिसात देखिए। सबसे पहले पार्टी ने यहां के चुनाव की पूरी कमान सौंप दी स्थानीय कोंडागांव विधायक और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम को। मोहन मरकाम ने इसका फायदा उठाया और जमकर हल्बी-गोंडी में भाषण दिए। उधर भाजपा की चूक देखिए धुर बस्तरिया सीट के उपचुनाव के लिए प्रभारी बना दिया भाटापारा विधायक शिवरतन शर्मा को। एेसा भी नहीं है कि शिवरतन शर्मा पार्टी के बड़े रणनीतिकार माने जाते हों या उन्होंने एेसी कोई नाजुक स्थिति संभाली हो। उनका साथ देने के लिए महेश गागड़ा, ओपी चौधरी, केदार कश्यप जैसे नेताओं को लगाया गया जो खुद की हार से ही हताश हैं। इधर कांग्रेस, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ पूरे मंत्रिमंडल को लेकर प्रचार में जुट गई। कांग्रेस ने एक मास्टर स्ट्रोक खेला और भीमा मंडावी की शहादत को यहां मुद्दा नहीं बनने दिया। पार्टी ने देवती कर्मा के प्रचार में महेंद्र कर्मा की शहादत की बात मजबूती से उठाई, जिससे शहीद की पत्नी की भावना सिर्फ ओजस्वी मंडावी के लिए नहीं रही।

कोई सहानुभूति वोट ओजस्वी को नहीं मिले। कांग्रेस ने एक और बेहतर मूव लिया और कर्मा परिवार के एेसे सदस्य जिनके व्यवहार को लेकर कार्यकर्ताओं ने शिकायत की थी, उन्हें चुनाव प्रचार से दूर रखा। बूथ मैनेजमेंट में कांग्रेस ने भाजपा की नीति अपनाई। एक-एक बूथ में कांग्रेस की बूथ कमेटी के सदस्य नियुक्त किए गए और उनकी मॉनिटरिंग की गई। नतीजा निकला कि गांव-गांव के बूथ में कांग्रेस के एजेंट तो थे लेकिन भाजपा के एजेंट नहीं दिखे। गांवों में वोटिंग का प्रतिशत बढ़ना इसी बात का प्रमाण है कि कांग्रेसी ग्रामीण कार्यकर्ताओं ने अपने वोटर्स को बाहर निकाला। इस जीत में कांग्रेस की एकजुटता की भी भागीदारी है।

पहले जैसी खींचतान, रूठना-मनाना इस बार दंतेवाड़ा के नेताओं, कार्यकर्ताओं में नहीं दिखा। सभी ने सरकार के दबाव में ही सही पार्टी के लिए काम किया और बस्तर की इकलौती सीट भी भाजपा से छीन ली। जिस कुशलता और बड़े अंतर के साथ कांग्रेस ने यह उपचुनाव जीता है, उससे लगता है कि पार्टी चुनाव मैनेजमेंट में भी परिपक्व हो रही है। यदि चुनावी दांव-पेंच में कांग्रेसी निपुण हो गए तो भाजपा को चिंता करनी ही पड़ेगी, क्योंकि जुनून और जिद तो कांग्रेस की पहले से पहचान रही है।

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