बिलासपुर। देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा मानी जाने वाली NEET-UG एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। राजस्थान से सामने आए पेपर लीक के आरोप, CBI जांच की नौबत और छात्रों के बढ़ते आक्रोश ने यह साबित कर दिया है कि भारत की परीक्षा प्रणाली अब भरोसे के गंभीर संकट से गुजर रही है। बिलासपुर में छात्र संगठन AIDSO द्वारा उठाई गई आवाज सिर्फ एक संगठन का विरोध नहीं, बल्कि उन लाखों छात्रों की पीड़ा है जो वर्षों की मेहनत के बाद भी व्यवस्था की अव्यवस्था के शिकार हो रहे हैं।
हर साल लाखों छात्र दिन-रात मेहनत कर डॉक्टर बनने का सपना देखते हैं। माता-पिता अपनी जमा पूंजी कोचिंग, किताबों और हॉस्टल पर खर्च कर देते हैं। लेकिन जब परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र बाजार में बिकने लगें, तो यह सिर्फ परीक्षा में गड़बड़ी नहीं रहती — यह मेहनत, ईमानदारी और सपनों की हत्या बन जाती है।
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कभी पेपर लीक, कभी सर्वर फेल, कभी रिजल्ट विवाद — एक के बाद एक घटनाएं यह संकेत देती हैं कि देश की सबसे बड़ी परीक्षाएं संचालित करने वाली एजेंसी या तो पूरी तरह असफल हो चुकी है या फिर उस पर ऐसे नेटवर्क हावी हैं जो शिक्षा को व्यापार बना चुके हैं। ऐसे में AIDSO की यह मांग कि NTA को परीक्षा संचालन से हटाया जाए, केवल राजनीतिक बयान नहीं बल्कि एक गंभीर बहस का विषय है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि इन घटनाओं का असर सिर्फ परीक्षा परिणामों तक सीमित नहीं रहता। मानसिक दबाव, अवसाद और भविष्य की अनिश्चितता छात्रों को भीतर से तोड़ रही है। लखीमपुर के छात्र ऋतिक मिश्रा का मामला इसी दर्दनाक सच्चाई की ओर इशारा करता है। जब एक छात्र यह महसूस करने लगे कि उसकी मेहनत का कोई मूल्य नहीं, तब यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विफलता होती है।
आज देश में शिक्षा धीरे-धीरे अवसर कम और कारोबार ज्यादा बनती जा रही है। मेडिकल शिक्षा का बढ़ता निजीकरण और महंगी कोचिंग संस्कृति छात्रों को एक ऐसी दौड़ में धकेल रही है जहां सफलता योग्यता से नहीं, सिस्टम की पहुंच और पैसे से तय होती दिख रही है। पेपर लीक इसी भ्रष्ट तंत्र का सबसे खतरनाक चेहरा है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं कि पेपर किसने लीक किया। असली सवाल यह है कि हर बार इतने बड़े घोटाले के बावजूद बड़े चेहरे बच कैसे जाते हैं? क्यों जांच रिपोर्टें धूल खाती रहती हैं? क्यों परीक्षा माफिया हर साल और मजबूत होकर सामने आते हैं? यदि इस बार भी जांच केवल छोटे दलालों तक सीमित रही, तो छात्रों का विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
AIDSO ने न्यायिक निगरानी में निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कठोर कार्रवाई और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली की मांग उठाकर एक जरूरी मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। यह सिर्फ छात्रों की लड़ाई नहीं, बल्कि उस देश की लड़ाई है जो योग्यता और समान अवसर की बात करता है।
सरकार को समझना होगा कि पेपर लीक कोई साधारण अपराध नहीं है। यह राष्ट्र की प्रतिभा पर हमला है। यदि मेडिकल जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं की विश्वसनीयता खत्म हो गई, तो आने वाली पीढ़ियां व्यवस्था पर भरोसा करना छोड़ देंगी।
अब समय आ गया है कि सरकार केवल आश्वासन नहीं, बल्कि कठोर और दिखने वाली कार्रवाई करे। क्योंकि छात्रों का गुस्सा सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं रहेगा — यह उस व्यवस्था के खिलाफ जनआंदोलन बन सकता है जिसने मेहनत को मजाक बना दिया है।


