बिलासपुर। देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, पेट्रोल-डीजल संकट और रोजमर्रा की बढ़ती लागत से जूझ रहा है। आम आदमी की रसोई पहले ही महंगी हो चुकी है, किसान खाद के लिए भटक रहा है, छोटे कारोबारी डीजल-पेट्रोल की कीमतों से टूट रहे हैं और मध्यम वर्ग अपनी बचत खत्म होने के डर में जी रहा है। ऐसे दौर में प्रधानमंत्री की अपील ने राहत देने के बजाय लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है।
प्रधानमंत्री ने देशवासियों से कहा — उर्वरक कम इस्तेमाल करें, वर्क फ्रॉम होम करें, खाद्य तेल कम उपयोग करें, गैस बचाएं, सोना न खरीदें और विदेश यात्रा से बचें। सवाल यह है कि क्या देश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी निभाने वाली सरकार अब समस्याओं का समाधान देने के बजाय जनता को “कम उपयोग” का उपदेश देने लगी है?
किसान पहले ही खाद संकट से जूझ रहा है। कई राज्यों में यूरिया और डीएपी की भारी कमी है। छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में जहां लगभग 15 लाख मीट्रिक टन उर्वरक की जरूरत है, वहां अब तक जरूरत का बड़ा हिस्सा ही सोसायटियों तक पहुंच पाया है। किसान लाइन में लग रहा है, महंगे दामों पर खाद खरीद रहा है, फिर भी सरकार व्यवस्था सुधारने के बजाय “कम उपयोग” की सलाह दे रही है।
किसानों की आय दोगुनी करने का वादा करने वाली सरकार अब ऐसी स्थिति में पहुंच गई है जहां किसान उत्पादन घटने और कर्ज बढ़ने के डर से खेती कर रहा है। अगर खाद नहीं मिलेगी तो उत्पादन कैसे बढ़ेगा? क्या देश आत्मनिर्भर खेती से पीछे लौटना चाहता है?
प्रधानमंत्री की “वर्क फ्रॉम होम” वाली सलाह सुनने में भले आधुनिक लगे, लेकिन देश की हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। भारत का बड़ा तबका दफ्तरों में नहीं, बल्कि सड़कों, बाजारों, खेतों और फैक्ट्रियों में काम करता है।
रिक्शा चालक, दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले, छोटे दुकानदार, डिलीवरी बॉय, फैक्ट्री कर्मचारी और खेत मजदूर आखिर “वर्क फ्रॉम होम” कैसे करेंगे? क्या सरकार के पास इनके लिए कोई जवाब है?
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था — “आराम हराम है।” आज हालात ऐसे हैं कि जनता को संदेश दिया जा रहा है — “घर बैठो, कम चलो, कम खर्च करो।”
महंगाई ने आम परिवार की रसोई बिगाड़ दी है। खाने का तेल, दाल, दूध, गैस, आटा, चावल — हर चीज के दाम लगातार बढ़े हैं। गृहिणियां पहले ही बजट में कटौती कर रही हैं। ऐसे में सरकार अगर यह कहे कि “तेल कम इस्तेमाल करें”, तो यह सलाह नहीं बल्कि मजबूरी का मजाक लगती है।
एक समय जो सामान मध्यम वर्ग आसानी से खरीद लेता था, आज वही सामान जेब पर भारी पड़ रहा है। गैस सिलेंडर 1000 रुपये के करीब पहुंच चुका है। पेट्रोल-डीजल के दाम आम आदमी की कमर तोड़ रहे हैं। दाल, तेल और मसाले तक आम आदमी की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं।
राजनीतिक भाषणों में कई बार आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। उदाहरण के तौर पर “सोना 50 गुना महंगा हो गया” वाला दावा तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। हालांकि यह भी सच है कि सोने की कीमतों में पिछले वर्षों में भारी बढ़ोतरी हुई है और आम परिवारों के लिए सोना खरीदना मुश्किल होता गया है।
लेकिन असली सवाल सोने का नहीं, खरीदने की क्षमता का है। जब आम आदमी की आमदनी उसी रफ्तार से नहीं बढ़ती, तब हर चीज महंगी महसूस होती है — चाहे वह सोना हो, पेट्रोल हो या रसोई का सामान।
केंद्र सरकार ने वर्षों तक पेट्रोलियम उत्पादों पर भारी टैक्स वसूला। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम थीं, तब भी जनता को सस्ता पेट्रोल-डीजल नहीं मिला। आज जब कीमतें बढ़ रही हैं, तब सरकार राहत देने के बजाय “कम उपयोग” की अपील कर रही है।
सवाल उठना स्वाभाविक है — अगर जनता से टैक्स लेकर सरकार ने बड़ी कमाई की, तो संकट के समय राहत क्यों नहीं दी जा रही?
विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि सरकार खुद खर्चों में कटौती नहीं करती, लेकिन जनता से बचत की अपील करती है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं, वीआईपी काफिले और सरकारी खर्च लंबे समय से राजनीतिक बहस का मुद्दा रहे हैं।
जनता पूछ रही है — क्या बचत केवल आम आदमी के लिए है? क्या सत्ता और सरकार पर वही नियम लागू नहीं होने चाहिए जो जनता पर लागू किए जा रहे हैं?
महंगाई और बेरोजगारी ने मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। कई परिवार अब रोजमर्रा का खर्च चलाने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं। बच्चों की पढ़ाई, इलाज, गैस, किराया और राशन — हर खर्च बढ़ चुका है।
जब कमाई स्थिर हो और खर्च लगातार बढ़े, तब “कम उपयोग करो” जैसी सलाह लोगों को समाधान नहीं, असंवेदनशीलता लगती है।
देश संकटों से पहले भी गुजरा है। तेल संकट, युद्ध, आर्थिक मंदी — भारत ने हर दौर देखा है। लेकिन हर दौर में सरकारों से अपेक्षा रही कि वे समाधान दें, व्यवस्था मजबूत करें और जनता को राहत दें।
आज देश यह पूछ रहा है — क्या सरकार का काम केवल सलाह देना है? क्या जनता हर समस्या का बोझ अकेले उठाए? क्या “कम खाओ, कम चलो, कम खर्च करो” ही नई आर्थिक नीति है?
जनता त्याग करने को तैयार रहती है, लेकिन तब जब उसे भरोसा हो कि सरकार भी उसके साथ खड़ी है। सिर्फ अपीलों से संकट नहीं सुलझते। उसके लिए ठोस नीति, जवाबदेही और संवेदनशील नेतृत्व चाहिए।


