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सुशासन के दावों के बीच शिक्षा विभाग से बड़ा सवाल: आखिर JK इंटरनेशनल स्कूल की जांच रिपोर्ट दबा कौन रहा है?…

बिलासपुर। एक तरफ प्रदेश सरकार “सुशासन तिहार” के मंच से पारदर्शिता, जवाबदेही और त्वरित शिकायत निराकरण का संदेश दे रही है। मुख्यमंत्री स्वयं बिलासपुर में अधिकारियों की बैठक लेकर विभागों की कार्यप्रणाली की समीक्षा कर रहे हैं। दूसरी तरफ फरहदा स्थित JK इंटरनेशनल स्कूल का मामला ऐसा उदाहरण बनकर सामने आया है, जिसने शिक्षा विभाग की कार्यशैली और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

CBSE निरीक्षण में सामने आई आपत्तियां, मान्यता को लेकर उठे सवाल, फीस वसूली से जुड़ी शिकायतें और अभिभावकों की लगातार चिंताओं के बावजूद एक माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी विभागीय जांच रिपोर्ट का सार्वजनिक न होना अब सामान्य प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह बनता जा रहा है।

विद्यालय को लेकर विवाद तब गहराया जब CBSE निरीक्षण के दौरान कई व्यवस्थाओं पर आपत्तियां दर्ज की गईं। विज्ञान एवं गणित प्रयोगशालाओं की स्थिति, सुरक्षा मानकों का अनुपालन, दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध सुविधाएं और दस्तावेजी विसंगतियों जैसे मुद्दों ने यह सवाल खड़ा किया कि यदि निरीक्षण में कमियां मिली थीं तो उनके निराकरण की वास्तविक स्थिति क्या है? और यदि कमियां दूर कर ली गई हैं तो उसकी आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल विद्यालय की मान्यता को लेकर भी बना हुआ है। यदि मान्यता संबंधी प्रक्रिया पूरी तरह वैध और स्पष्ट है तो विभाग को स्थिति सार्वजनिक करने में संकोच क्यों है? और यदि नवीनीकरण अथवा अन्य प्रक्रियाएं लंबित हैं तो उस दौरान निगरानी और नियमन की व्यवस्था क्या रही? इन सवालों का उत्तर आज तक अभिभावकों को नहीं मिल सका है।

विवाद केवल मान्यता तक सीमित नहीं है। विद्यालय की फीस संरचना और निजी प्रकाशकों की पुस्तकों के उपयोग को लेकर भी अभिभावकों ने गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। कई अभिभावकों का आरोप है कि शुल्क निर्धारण और अतिरिक्त आर्थिक भार को लेकर स्पष्टता नहीं है। शिकायतें सही हैं या गलत, इसका फैसला जांच रिपोर्ट ही करेगी, लेकिन जांच पूरी होने के बाद भी रिपोर्ट सामने नहीं आना संदेह और असमंजस को और बढ़ा रहा है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि शिकायतों के बाद विभागीय जांच दल गठित किया गया था। जांच पूरी होने की चर्चा भी हुई, लेकिन एक माह से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई। आखिर ऐसा क्या है जो रिपोर्ट को फाइलों से बाहर आने से रोक रहा है? यदि शिकायतें निराधार हैं तो विद्यालय को क्लीन चिट देकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही? और यदि जांच में अनियमितताएं सामने आई हैं तो कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?

यहीं से मामला केवल एक निजी स्कूल का नहीं रह जाता, बल्कि शिक्षा विभाग की जवाबदेही की परीक्षा बन जाता है। मुख्यमंत्री अधिकारियों को लगातार समयबद्ध निराकरण और पारदर्शी प्रशासन का संदेश दे रहे हैं, लेकिन बिलासपुर का यह चर्चित मामला उन्हीं दावों की वास्तविकता को कठघरे में खड़ा करता दिखाई दे रहा है।

हजारों अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य को निजी विद्यालयों के भरोसे सौंपते हैं। ऐसे में किसी संस्थान के खिलाफ गंभीर शिकायतें सामने आने के बाद भी यदि जांच प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक खिंचती रहे तो स्वाभाविक रूप से विश्वास कमजोर होता है। अभिभावकों का सीधा सवाल है कि आखिर रिपोर्ट कब आएगी और शिकायतों पर विभाग ने क्या निर्णय लिया है?

सुशासन तिहार के बीच बिलासपुर में दो तस्वीरें समानांतर दिखाई दे रही हैं। एक तरफ मंचों से पारदर्शिता और जवाबदेही के दावे, दूसरी तरफ JK इंटरनेशनल स्कूल की वह जांच रिपोर्ट जिसका इंतजार एक माह से किया जा रहा है। अब सवाल केवल रिपोर्ट का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक इच्छाशक्ति का है जो यह तय करेगी कि सुशासन का अर्थ वास्तव में जवाबदेही है या फिर यह भी उन फाइलों में दर्ज एक नारा बनकर रह जाएगा, जिनका जवाब जनता आज भी तलाश रही है।

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