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जीएम-डीआरएम दफ्तर के साए में मौत का डिवाइडर! हर रात टूटती हैं गाड़ियां, हर दिन उठते हैं सवाल, फिर भी जिम्मेदार बेखबर…

बिलासपुर। शहर में विकास और यातायात सुधार के नाम पर बनाए गए कई ढांचे आज लोगों की सुरक्षा के बजाय उनके लिए खतरा बनते जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण व्यापार विहार से रेलवे स्टेशन जाने वाले बारह खोली मार्ग पर स्थित वह डिवाइडर है, जो बिलासपुर रेलवे के जीएम ऑफिस (जोनल) और डीआरएम कार्यालय से महज कुछ दूरी पर मौजूद है। हैरानी की बात यह है कि रेलवे के आला अधिकारियों के कार्यालयों के आसपास स्थित यह डिवाइडर रोजाना दुर्घटनाओं का कारण बन रहा है, लेकिन इसके बावजूद इसे सुरक्षित बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

स्थानीय लोगों और सड़क से रोज गुजरने वालों का कहना है कि इस डिवाइडर से टकराकर वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाएं अब सामान्य बात बन चुकी हैं। दिन के उजाले में तो चालक किसी तरह इसे देख लेते हैं, लेकिन रात के समय यह डिवाइडर अचानक सामने आने वाले जाल की तरह साबित होता है। न पर्याप्त रिफ्लेक्टर, न फ्लोरोसेंट मार्किंग और न ही कोई प्रभावी चेतावनी बोर्ड—ऐसे में अनजान चालक सीधे डिवाइडर से टकरा जाते हैं।

 

क्रेन ऑपरेटरों और आसपास के लोगों का दावा है कि इस स्थान पर लगभग रोजाना कोई न कोई वाहन दुर्घटना का शिकार होता है। कई बार परिवार के साथ रेलवे स्टेशन जा रहे लोग या ट्रेन से लौट रहे यात्रियों को लेने पहुंचे वाहन चालक इस डिवाइडर से टकरा जाते हैं। परिणामस्वरूप गाड़ियों को भारी नुकसान होता है और कई मामलों में लोगों को गंभीर चोटें भी आती हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किसी स्थान पर लगातार दुर्घटनाएं हो रही हों तो क्या संबंधित विभागों को इसकी जानकारी नहीं है? और यदि जानकारी है तो फिर सुधारात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही?

स्थानीय नागरिकों का मानना है कि समस्या केवल चेतावनी संकेतों की कमी नहीं है, बल्कि डिवाइडर की डिजाइन और उसकी स्थिति भी विवाद का विषय है। लोगों का कहना है कि जिस तरह से इसे बनाया गया है, वह सड़क की स्वाभाविक दिशा और वाहन चालकों की दृश्य सीमा के अनुरूप नहीं है। यही कारण है कि नए या बाहरी वाहन चालक अक्सर भ्रमित हो जाते हैं।

यही वजह है कि अब लोग खुले तौर पर इस डिवाइडर को बनाने वाले इंजीनियरों और इसकी स्वीकृति देने वाले अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाने लगे हैं। आखिर ऐसा कौन-सा तकनीकी मापदंड अपनाया गया था, जिसके बाद भी यह डिवाइडर लगातार दुर्घटनाओं का केंद्र बना हुआ है?

विडंबना यह है कि यह खतरनाक स्थान किसी सुनसान इलाके में नहीं, बल्कि रेलवे प्रशासन के सबसे महत्वपूर्ण कार्यालयों के आसपास मौजूद है। यदि अधिकारियों के कार्यालयों के सामने की सड़कें ही सुरक्षित नहीं हैं तो शहर के अन्य इलाकों की स्थिति का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।

कौन देगा जवाब?

जब एक ही स्थान पर बार-बार दुर्घटनाएं हो रही हों, लोगों की गाड़ियां क्षतिग्रस्त हो रही हों, उन्हें अस्पताल पहुंचना पड़ रहा हो और फिर भी व्यवस्था मौन बनी रहे, तो यह केवल तकनीकी खामी नहीं बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का मामला बन जाता है।

अब जरूरत है कि संबंधित विभाग तत्काल इस डिवाइडर का तकनीकी ऑडिट कराए, रिफ्लेक्टर और हाई-विजिबिलिटी चेतावनी संकेत लगाए जाएं तथा यदि डिजाइन में खामी पाई जाती है तो उसे तत्काल संशोधित किया जाए। क्योंकि किसी भी सड़क का उद्देश्य यातायात को सुरक्षित बनाना होता है, दुर्घटनाओं का स्थायी अड्डा बनाना नहीं।

सवाल सिर्फ एक डिवाइडर का नहीं है, सवाल उन जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही का है जिनकी आंखों के सामने रोज हादसे हो रहे हैं, लेकिन व्यवस्था अब भी ‘अगले हादसे’ का इंतजार करती नजर आ रही है।

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