
बिलासपुर। बेलतरा विधानसभा क्षेत्र की बदहाल सड़कें अब केवल आवागमन की परेशानी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था, निर्माण कार्यों की गति और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनती जा रही हैं। कहीं सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं, तो कहीं उड़ती धूल लोगों की परेशानी बढ़ा रही है। कई मार्गों पर अधूरे निर्माण और मरम्मत की स्थिति के बीच अब डामर की बढ़ती कीमतों और ठेकेदारों को अतिरिक्त भुगतान का मुद्दा भी गरमा गया है। कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने इसी मुद्दे को लेकर सवाल उठाया है कि जब निर्माण लागत बढ़ने पर ठेकेदारों को राहत देने की व्यवस्था की जा सकती है, तो बेलतरा की जनता को बदहाल सड़कों से मुक्ति दिलाने के लिए ठोस कदम कब उठाए जाएंगे?
गौरहा का सवाल सीधा है—सरकार और सड़क ठेकेदारों के बीच लागत और भुगतान को लेकर विवाद है, तो उसकी सजा आम जनता क्यों भुगते? सड़क बनाने की जिम्मेदारी सरकार और संबंधित एजेंसियों की है, निर्माण कार्य ठेकेदारों के माध्यम से होते हैं, लेकिन सड़क पर चलने वाला आम नागरिक न तो अनुबंध की शर्तें तय करता है और न ही भुगतान संबंधी विवादों में उसकी कोई भूमिका होती है। इसके बावजूद यदि निर्माण कार्य प्रभावित होते हैं, तो सबसे ज्यादा परेशानी उसी को झेलनी पड़ती है।
छत्तीसगढ़ शासन के लोक निर्माण विभाग ने 31 मई 2026 को जारी आदेश के माध्यम से डामर की कीमतों में असाधारण वृद्धि को देखते हुए निर्धारित शर्तों के अधीन पात्र अनुबंधित कार्यों के लिए अतिरिक्त भुगतान की व्यवस्था की है। यह व्यवस्था 1 अप्रैल से 30 जून 2026 की अवधि के लिए लागू की गई थी। इसका उद्देश्य बढ़ी हुई निर्माण लागत के कारण सड़क निर्माण, नवीनीकरण और रखरखाव के कामों को प्रभावित होने से बचाना है।
निर्माण सामग्री की कीमतों में असामान्य वृद्धि होने पर ठेकेदारों को नियमानुसार राहत देना एक प्रशासनिक और अनुबंध संबंधी निर्णय हो सकता है। लेकिन इस व्यवस्था के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि जिन सड़कों के निर्माण और मरम्मत का काम जनता के लिए जरूरी है, वे अनिश्चितकाल तक अधूरे न पड़े रहें।
यहीं से सवाल उठता है कि राहत की व्यवस्था का वास्तविक लाभ क्या केवल अनुबंधों और भुगतान की प्रक्रिया तक सीमित रहेगा, या फिर इससे जमीन पर निर्माण कार्यों को भी गति मिलेगी? पात्र कार्यों की वर्तमान स्थिति, भुगतान की प्रक्रिया और निर्माण पूरा होने की समयसीमा को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए।
अंकित गौरहा पहले भी बेलतरा क्षेत्र की कई सड़कों की खराब स्थिति को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। इनमें मंगला चौक से दीनदयाल कॉलोनी, अशोक नगर से बिरकोना, चांटीडीह चौक से डीएलएस कॉलेज मार्ग, सेंदरी से मोपका बायपास, राजकिशोर नगर चौक से छठघाट और साइंस कॉलेज से सब्जी मंडी मार्ग जैसे महत्वपूर्ण रास्ते शामिल हैं।
इन मार्गों को लेकर उठाए गए सवालों के बीच अब यह जानना जरूरी हो गया है कि किन सड़कों के निर्माण या नवीनीकरण को मंजूरी मिल चुकी है, किनका काम शुरू हुआ है, कहां मरम्मत की जरूरत बनी हुई है और कौन-से कार्य अब भी लंबित हैं। केवल प्रस्ताव, स्वीकृति या बजट की जानकारी से जनता की परेशानी दूर नहीं होगी। लोगों को यह भी पता चलना चाहिए कि जिस सड़क के सुधार की बात कही जा रही है, उस पर काम कब शुरू होगा और कब पूरा होगा।
सड़कों की बदहाली का असर रोजमर्रा के जीवन पर पड़ता है। गड्ढों से वाहनों को नुकसान पहुंचता है, धूल से आसपास के रहवासियों और दुकानदारों को परेशानी होती है तथा खराब सड़कें दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ा सकती हैं। ऐसे में सड़क सुधार को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मानकर टालना जनता की समस्याओं को लंबा खींचने जैसा है।
गौरहा ने नगर निगम के ठेकेदारों की बढ़ी हुई निर्माण लागत के कारण राहत की मांग का मुद्दा भी उठाया है। उनका सवाल है कि जब लोक निर्माण विभाग के पात्र अनुबंधों के लिए विशेष व्यवस्था बनाई जा सकती है, तो नगर निगम के सड़क निर्माण और मरम्मत कार्यों में लागत बढ़ने से पैदा हुई समस्याओं पर भी स्पष्ट निर्णय क्यों नहीं होना चाहिए?
हालांकि लोक निर्माण विभाग और नगर निगम के अनुबंधों की शर्तें अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि नगर निगम के संबंधित ठेकों, भुगतान की शर्तों और अतिरिक्त भुगतान की पात्रता को लेकर स्थिति स्पष्ट की जाए। यदि ठेकेदारों की मांग नियमानुसार विचार योग्य है, तो उस पर समयबद्ध निर्णय हो। यदि अतिरिक्त भुगतान का प्रावधान लागू नहीं होता, तो उसकी वजह भी सार्वजनिक की जाए।
सबसे अहम बात यह है कि भुगतान और लागत के विवाद का इस्तेमाल निर्माण कार्यों में अनिश्चितकालीन देरी का कारण नहीं बनने दिया जाना चाहिए। संबंधित विभागों को ऐसा रास्ता निकालना होगा, जिससे नियमों का पालन भी हो और जनता को सड़क की सुविधा के लिए महीनों इंतजार भी न करना पड़े।
बेलतरा की जनता को अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि स्पष्ट जवाब चाहिए। संबंधित विभागों को लंबित सड़क कार्यों की सूची, स्वीकृत बजट, खर्च की स्थिति, ठेकेदारों के भुगतान का विवरण और काम पूरा करने की समयसीमा सार्वजनिक करनी चाहिए। जिन कार्यों में लागत बढ़ने या भुगतान संबंधी विवाद के कारण बाधा आ रही है, उनकी अलग से समीक्षा होनी चाहिए।
साथ ही, जिन सड़कों पर तत्काल मरम्मत की आवश्यकता है, वहां स्थायी निर्माण पूरा होने तक जरूरी सुधार के कदम उठाए जाने चाहिए। सड़क सुरक्षा और नागरिकों की सुविधा को किसी भी वित्तीय या प्रशासनिक विवाद से नीचे नहीं रखा जा सकता।
सड़क निर्माण में लागत बढ़ना एक वास्तविक चुनौती हो सकती है। ठेकेदारों की मांगों पर नियमानुसार विचार करना भी जरूरी है। लेकिन सरकार और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी केवल अनुबंधों का प्रबंधन करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन से होने वाले विकास कार्यों को समय पर पूरा कराना भी है।
अंकित गौरहा ने इसी मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार और ठेकेदारों के बीच लागत तथा भुगतान की समस्या का समाधान आखिर कब होगा और बेलतरा की बदहाल सड़कों से जूझ रही जनता को राहत कब मिलेगी? उनका कहना है कि जनता को फाइलों में चल रही प्रक्रिया के साथ-साथ जमीन पर सुधरती सड़कें भी दिखाई देनी चाहिए।
अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग स्थिति स्पष्ट करें, लंबित कार्यों की बाधाएं दूर करें और हर सड़क के लिए जवाबदेही तय करें। क्योंकि विकास का मूल्यांकन आदेशों, घोषणाओं और स्वीकृतियों से नहीं, बल्कि जनता को मिलने वाली वास्तविक सुविधा से होता है।
सवाल आज भी वही है—जब सरकार और ठेकेदारों के बीच लागत और भुगतान का हिसाब सुलझाने की व्यवस्था हो सकती है, तो बेलतरा की जनता को गड्ढों, धूल और अधूरी सड़कों से राहत दिलाने की समयसीमा कौन तय करेगा?

