
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर को बेहतर हवाई सुविधा दिलाने की मांग अब सिर्फ एयरपोर्ट के विस्तार तक सीमित नहीं रह गई है। यह सवाल बन चुकी है कि प्रदेश के दूसरे प्रमुख शहर को आखिर कब तक बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ेगा? सात साल से लगातार आंदोलन, ज्ञापन और मांगों के बावजूद यदि बिलासपुर के हवाई संपर्क को अपेक्षित मजबूती नहीं मिल पा रही है, तो जिम्मेदार कौन है—केंद्र सरकार, राज्य सरकार, संबंधित विमानन प्राधिकरण या फिर वे जनप्रतिनिधि, जिन पर क्षेत्र की आवाज सरकार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है?
26 अक्टूबर को हवाई सुविधा जन संघर्ष समिति के आंदोलन के सात वर्ष पूरे हो गए। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज्ञापन भेजकर बिलासपुर एयरपोर्ट को 4C श्रेणी में विकसित करने की मांग फिर उठाई गई। सात वर्षों का यह संघर्ष अपने आप में बताता है कि बिलासपुर के नागरिकों के लिए बेहतर हवाई सुविधा कोई तात्कालिक मांग नहीं, बल्कि लंबे समय से लंबित विकास का मुद्दा है। लेकिन सवाल यह है कि सात साल बाद भी इस मांग को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने वाली ठोस कार्ययोजना कहां है?
बिलासपुर कोई सामान्य शहर नहीं है। यहां छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय है, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे का मुख्यालय है, केंद्रीय विश्वविद्यालय है और चिकित्सा सहित कई महत्वपूर्ण संस्थान मौजूद हैं। कोयला उद्योग, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक गतिविधियों के लिहाज से भी यह शहर पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बिलासपुर केवल अपने नागरिकों की जरूरतें पूरी नहीं करता, बल्कि आसपास के जिलों के लोग भी इलाज, पढ़ाई, न्यायिक कार्य, व्यापार और रोजगार के लिए यहां पहुंचते हैं। ऐसे में बेहतर हवाई संपर्क की आवश्यकता को नजरअंदाज करना क्षेत्रीय विकास की संभावनाओं को सीमित करने जैसा है।
विडंबना यह है कि जिस शहर की पहचान प्रदेश की न्यायधानी के रूप में है, उसी शहर के लोगों को देश के प्रमुख महानगरों तक बेहतर हवाई कनेक्टिविटी के लिए लगातार आवाज उठानी पड़ रही है। सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बड़े संस्थानों की मौजूदगी के अनुरूप परिवहन सुविधाएं विकसित करना सरकारों की प्राथमिकता में शामिल नहीं होना चाहिए?
हवाई सुविधा जन संघर्ष समिति की प्रमुख मांग बिलासपुर एयरपोर्ट को 4C श्रेणी में उन्नत करने की है। समिति के ज्ञापन के अनुसार, इसके लिए रनवे की लंबाई मौजूदा 1500 मीटर से बढ़ाकर 2800 मीटर करने, स्थायी एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर स्थापित करने और नए टर्मिनल भवन सहित जरूरी सुविधाएं विकसित करने की आवश्यकता है। इस पूरी परियोजना के लिए लगभग 300 करोड़ रुपये की जरूरत बताई गई है।
यह राशि और प्रस्तावित तकनीकी आवश्यकताएं विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तथा संबंधित प्राधिकरणों के आकलन से अंतिम रूप लेंगी। लेकिन जनता का सवाल इससे कहीं अधिक सीधा है—यदि एयरपोर्ट का विस्तार जरूरी है, तो इसकी व्यवहार्यता का आकलन कब पूरा होगा? बजट की व्यवस्था कौन करेगा? तकनीकी स्वीकृतियों की स्थिति क्या है? और सबसे महत्वपूर्ण, यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिलने की संभावित समयसीमा क्या है?
इन सवालों का जवाब केवल आश्वासनों से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए स्पष्ट दस्तावेज, जिम्मेदार विभाग और समयबद्ध कार्ययोजना सामने आनी चाहिए।
समिति का आरोप है कि बिलासपुर एयरपोर्ट के लिए राज्य के बजट में अपेक्षित राशि का प्रावधान नहीं हो रहा है और केंद्र के नागरिक उड्डयन मंत्रालय से भी पर्याप्त विशेष सहायता नहीं मिल रही है। यदि ऐसा है, तो यह स्थिति गंभीर सवाल खड़े करती है।
आखिर परियोजना किस स्तर पर अटकी हुई है? क्या जमीन से जुड़ी कोई बाधा है? क्या वित्तीय स्वीकृति लंबित है? क्या तकनीकी मंजूरी में देरी हो रही है? या फिर इस परियोजना को उतनी प्राथमिकता ही नहीं मिल रही, जितनी मिलनी चाहिए?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों को देना चाहिए। बिना आधिकारिक जानकारी के किसी एक पक्ष को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन यह भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि सात वर्षों से उठ रही मांग पर जनता को स्थिति स्पष्ट करने की जिम्मेदारी किसी की नहीं है।
बिलासपुर दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे का प्रमुख केंद्र है। कोयला परिवहन और उससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियां भी इस क्षेत्र के महत्व को बढ़ाती हैं। यहां व्यापारिक गतिविधियां हैं, औद्योगिक संभावनाएं हैं और बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्हें दूसरे राज्यों तक पहुंचने के लिए सुविधाजनक परिवहन की जरूरत होती है।
इसके बावजूद बेहतर हवाई संपर्क के लिए लगातार संघर्ष होना क्षेत्रीय विकास की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। आर्थिक योगदान देने वाले किसी क्षेत्र को बेहतर परिवहन सुविधाएं मिलना कोई विशेष कृपा नहीं, बल्कि संतुलित विकास की जरूरत है।
हवाई सेवाओं का विस्तार होने से मरीजों को बड़े चिकित्सा केंद्रों तक पहुंचने में सुविधा मिल सकती है। व्यापारियों और उद्योगपतियों का आवागमन आसान हो सकता है। विद्यार्थियों, अधिकारियों और आम यात्रियों को भी लाभ मिल सकता है। इसके साथ ही निवेश, पर्यटन और रोजगार की संभावनाओं को बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि केवल एयरपोर्ट का विस्तार कर देना पर्याप्त नहीं होगा। बेहतर कनेक्टिविटी के लिए एयरलाइंस की रुचि, व्यावसायिक व्यवहार्यता, पर्याप्त यात्री मांग और नियमित उड़ानों की उपलब्धता भी जरूरी है। इसलिए सरकारों को सिर्फ निर्माण की नहीं, बल्कि लंबे समय तक प्रभावी हवाई सेवा सुनिश्चित करने की भी योजना बनानी होगी।
बिलासपुर की हवाई सुविधा का मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के हित से जुड़ा है। ऐसे में स्थानीय सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
जनता ने अपने प्रतिनिधियों को केवल चुनाव के समय क्षेत्र की समस्याएं गिनाने के लिए नहीं चुना है। उनसे अपेक्षा है कि वे संबंधित मंत्रालयों के साथ लगातार संवाद करें, परियोजना की स्थिति सार्वजनिक करें, बजट और स्वीकृतियों के लिए दबाव बनाएं तथा जरूरत पड़ने पर सभी दलों को साथ लेकर निर्णायक पहल करें।
यदि कोई बाधा है, तो उसे जनता के सामने रखा जाना चाहिए। यदि केंद्र से स्वीकृति लंबित है, तो उसकी जानकारी दी जानी चाहिए। यदि राज्य सरकार की ओर से बजट या जमीन संबंधी कार्यवाही बाकी है, तो उसकी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
यह भी जरूरी है कि एयरपोर्ट विस्तार के मुद्दे को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रखा जाए। बिलासपुर के नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि वर्तमान में एयरपोर्ट उन्नयन की फाइल कहां तक पहुंची है, कितनी राशि की जरूरत है, कौन-कौन सी मंजूरियां मिल चुकी हैं और किन विभागों के स्तर पर काम लंबित है।
यदि परियोजना व्यावहारिक है, तो उसके लिए चरणबद्ध कार्ययोजना सामने आनी चाहिए। यदि कोई तकनीकी या वित्तीय अड़चन है, तो उसके समाधान का रास्ता बताया जाना चाहिए। और यदि किसी कारण से तय समय में काम संभव नहीं है, तो उसकी वजह स्पष्ट की जानी चाहिए।
लोकतंत्र में जवाबदेही का अर्थ यही है कि जनता के सवालों का जवाब दिया जाए और घोषणाओं को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी तय हो।
हवाई सुविधा जन संघर्ष समिति का सात वर्षों का आंदोलन नागरिक भागीदारी का उदाहरण है। लगातार शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग उठाना आसान नहीं होता। लेकिन किसी भी आंदोलन की सफलता केवल ज्ञापन सौंपने, धरना देने या मांग दोहराने से नहीं मापी जा सकती।
उसकी असली सफलता तब होगी, जब परियोजना को लेकर ठोस निर्णय हो, आवश्यक स्वीकृतियां मिलें, बजट सुनिश्चित हो, निर्माण कार्य शुरू हो और अंततः यात्रियों को बेहतर हवाई सेवाओं का वास्तविक लाभ मिलने लगे।
अब जरूरत इस बात की है कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार, नागरिक उड्डयन मंत्रालय और संबंधित विमानन प्राधिकरण आपसी समन्वय से इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाएं। बिलासपुर के जनप्रतिनिधियों को भी दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर क्षेत्र के हित में एकजुट पहल करनी चाहिए।
बिलासपुर को बेहतर हवाई सुविधा देना किसी शहर पर एहसान नहीं होगा। यह उस क्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का कदम होगा, जो न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, रेलवे और आर्थिक गतिविधियों के लिहाज से पहले से ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि बिलासपुर को 4C एयरपोर्ट कब मिलेगा। असली सवाल यह है कि सात साल से उठ रही मांग को निर्णय तक पहुंचाने की जिम्मेदारी कौन लेगा?
आखिर कब तक बिलासपुर के लोग बेहतर हवाई सुविधा की उम्मीद में आंदोलन करते रहेंगे? कब तक परियोजना की लागत, बजट और स्वीकृतियों को लेकर स्पष्ट जवाब का इंतजार करना पड़ेगा? और कब जनप्रतिनिधि जनता को यह बता सकेंगे कि बिलासपुर के हवाई भविष्य को लेकर अगला ठोस कदम क्या है?
सात साल का संघर्ष अब जवाब मांग रहा है। बिलासपुर को केवल आश्वासन नहीं, स्पष्ट कार्ययोजना, तय समयसीमा और धरातल पर परिणाम चाहिए।

