बिलासपुर जिले में धान खरीदी की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन पहले ही दिन अव्यवस्थाएं सामने आईं। धान खरीदी के इस सीजन में देरी के कारण किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिससे राज्य सरकार के दावों की पोल खुल गई। जिले में 140 धान खरीदी केंद्र स्थापित किए गए हैं, लेकिन कई केंद्रों में खरीदी व्यवस्थित नहीं हो सकी। कुछ जगहों पर फसल नहीं कटी थी, जबकि अन्य केंद्रों पर नोडल अधिकारियों की गैरमौजूदगी ने स्थिति और बिगाड़ दी।
धान खरीदी की शुरुआत 14 नवंबर से हुई और यह अभियान 31 जनवरी तक चलने वाला है। किसानों को इस बार केवल एक पखवाड़े का समय मिल रहा है, जो पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम है। पहले धान खरीदी की समय सीमा 15 फरवरी तक बढ़ाई जाती थी, लेकिन इस बार इसे 31 जनवरी तक सीमित कर दिया गया है। इसके चलते, यदि किसी किसान को देरी होती है, तो उसके धान की खरीदी नहीं हो सकेगी।
धान खरीदी के पहले दिन, प्रशासन ने 194 टोकन जारी किए, जिससे लगभग 9 हजार क्विंटल धान की खरीदी हो पाई। इस प्रक्रिया को हाइटेक बनाने की कोशिश की गई, जहां टोकन एप का उपयोग ज्यादा हुआ। फिर भी, कई जगहों पर अव्यवस्था बनी रही।
प्रशासन ने नोडल अधिकारियों को खरीदी केंद्रों पर तैनात किया था, ताकि वे व्यवस्था पर नजर रख सकें। लेकिन बिरकोना, बैंमा और पौंसरा में नोडल अधिकारी गायब मिले, जिससे किसानों की परेशानी बढ़ गई। सेमरताल में तो स्थिति यह थी कि खरीदी मैनुअल कांटे से की गई, जोकि इलेक्ट्रॉनिक तौल मशीन की जगह इस्तेमाल हुआ।
धान खरीदी केंद्रों में कई तरह की कमियां देखने को मिलीं। कुछ समितियों में इलेक्ट्रॉनिक तौल मशीन बंद कमरों में रखी गई थीं, जबकि कहीं तिरपाल और चबूतरे की व्यवस्था नहीं थी। इससे किसानों को धान तौलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। साथ ही, सीसीटीवी कैमरों की अनुपस्थिति भी सुरक्षा और निगरानी में एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। कुछ समितियों के प्रबंधकों ने कैमरे न होने पर गोलमोल जवाब दिए, जिससे उनकी लापरवाही स्पष्ट हो जाती है।
धान खरीदी में देरी का मुख्य कारण फसल की कटाई में विलंब था। कई किसानों ने बताया कि वे फसल पूरी तरह से नहीं काट पाए थे। बड़ी संख्या में किसानों ने अब तक धान खरीदी केंद्रों का रुख नहीं किया, क्योंकि उनकी फसल तैयार नहीं हुई थी।
किसानों का कहना है कि यदि धान पहले काटा जाए और फिर लंबे समय तक रखा जाए, तो इसका वजन घट जाता है, जिससे उन्हें नुकसान होता है। यही कारण है कि वे धान खरीदी के दौरान ही फसल काटना पसंद करते हैं ताकि सीधे समिति में धान बेचा जा सके।
समितियों के प्रबंधक धान खरीदी में अहम भूमिका निभाते हैं। हालांकि, अगर प्रबंधक हड़ताल पर रहते, तो धान खरीदी की प्रक्रिया में और भी बाधाएं आ सकती थीं। प्रबंधकों ने यह साफ किया कि उनकी तीन सूत्रीय मांगों को पूरा नहीं किया गया होता, तो हड़ताल जारी रहती और धान खरीदी प्रभावित होती।
प्रशासन ने धान खरीदी को लेकर कई दावे किए थे, लेकिन जमीनी हकीकत अलग दिखी। अधिकारियों की लापरवाही और केंद्रों में संसाधनों की कमी ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दीं। धान खरीदी की निगरानी के लिए सीसीटीवी की व्यवस्था भी ठीक से नहीं हो सकी। प्रशासन का दावा था कि खरीदी प्रक्रिया सुचारू रहेगी, लेकिन कई जगहों पर स्थिति इसके विपरीत दिखी।
धान खरीदी के पहले दिन की समस्याओं को देखते हुए यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार और जिला प्रशासन को इस प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए और भी कदम उठाने होंगे। नोडल अधिकारियों की तैनाती, संसाधनों की उचित व्यवस्था और किसानों को समय पर फसल बेचने के लिए पर्याप्त समय देने जैसे मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए।
बिलासपुर जिले में धान खरीदी की प्रक्रिया की शुरुआत अव्यवस्था के साथ हुई। प्रशासन की ओर से की गई तैयारियों में कई खामियां दिखाई दीं। किसानों को समय पर फसल बेचने के लिए उचित व्यवस्था और समर्थन न मिल पाने के कारण वे परेशान हैं। सरकार को चाहिए कि वह इन समस्याओं का समाधान करे और किसानों के हित में ठोस कदम उठाए ताकि धान खरीदी की प्रक्रिया सुचारू और पारदर्शी हो सके।


