बिलासपुर।
शिक्षा को समाज निर्माण की नींव माना जाता है, लेकिन जब यही व्यवस्था नियमों की अनदेखी, मनमानी वसूली और प्रभाव के संरक्षण का माध्यम बन जाए, तो सवाल केवल एक स्कूल पर नहीं बल्कि पूरे सिस्टम पर खड़े होते हैं। तिफरा स्थित मॉडर्न एंड मॉरल पब्लिक स्कूल का मामला अब ठीक उसी मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां अभिभावकों की नाराजगी एक बड़े शिक्षा तंत्र की विफलता की कहानी कहने लगी है।
आरोप बेहद गंभीर हैं। कहा जा रहा है कि जिस स्कूल को कभी केवल नर्सरी से 8वीं तक की मान्यता मिली थी, उसने मान्यता अवधि खत्म होने के बाद उसका नवीनीकरण तक नहीं कराया। इसके बावजूद न केवल स्कूल चलता रहा, बल्कि 9वीं से 12वीं तक की कक्षाएं भी शुरू कर दी गईं। यदि यह सच है, तो सवाल सीधा है— आखिर किसके भरोसे और किस संरक्षण में बिना वैध मान्यता के बच्चों का भविष्य दांव पर लगाया गया?
मामला केवल मान्यता तक सीमित नहीं है। अभिभावकों का आरोप है कि फीस वसूली पूरी तरह अपारदर्शी तरीके से की जा रही है। छत्तीसगढ़ फीस विनियमन अधिनियम, 2020 स्पष्ट रूप से फीस निर्धारण समिति और मदवार जानकारी देने की बात करता है, लेकिन यहां स्थिति उलट दिखाई देती है। अभिभावकों को यह तक नहीं बताया जाता कि वे किस मद में कितना भुगतान कर रहे हैं। फीस एकमुश्त किश्तों में ली जा रही है, कई मामलों में रसीद तक नहीं दी जा रही। यह केवल नियम उल्लंघन नहीं, बल्कि अभिभावकों के अधिकारों की सीधी अनदेखी है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि नर्सरी के बच्चों से भी लैब और लाइब्रेरी शुल्क वसूले जाने के आरोप हैं। सवाल उठता है कि जिस उम्र में बच्चे अक्षर पहचानना सीख रहे हों, वहां लैब फीस किस बात की? इसी तरह खेल गतिविधियों में भाग न लेने वाले बच्चों से भी स्पोर्ट्स फीस ली जा रही है। परिवहन शुल्क अलग से भारी भरकम। यानी शिक्षा अब सुविधा नहीं, पैकेज्ड कारोबार की तरह संचालित होती दिखाई दे रही है।
स्कूल परिसर में फीस संरचना सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित न होना भी गंभीर मुद्दा है। नियम कहते हैं कि फीस और उसकी वृद्धि की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए, लेकिन अभिभावकों का दावा है कि यहां सब कुछ पर्दे के पीछे तय होता है। जब पारदर्शिता ही गायब हो जाए, तो भरोसा कैसे बचेगा?
इस पूरे विवाद में एक और बड़ा सवाल सीबीएसई एफिलिएशन के दावे को लेकर उठ रहा है। यदि मूल मान्यता की स्थिति ही संदिग्ध है, तो फिर एफिलिएशन का दावा किस आधार पर किया जा रहा है? यह केवल तकनीकी विसंगति नहीं, बल्कि छात्रों और अभिभावकों के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है। क्योंकि किसी भी समय यदि नियमों का उल्लंघन साबित होता है, तो सबसे बड़ा नुकसान उन बच्चों को होगा जिनका इन फैसलों से कोई लेना-देना नहीं।
मामले को और अधिक विवादित तब बना दिया, जब स्कूल प्रबंधन की ओर से कथित रूप से यह कहा गया कि “यह शहर के एक रसूखदार व्यक्ति का स्कूल है और उनके रहते संस्थान को कोई खतरा नहीं।” यह बयान केवल अहंकार नहीं दर्शाता, बल्कि उस मानसिकता को भी उजागर करता है जिसमें नियमों से ऊपर पहुंच और प्रभाव को माना जाता है। यदि किसी संस्थान को सचमुच यह भरोसा है कि प्रभाव के दम पर कार्रवाई नहीं होगी, तो यह प्रशासनिक तंत्र के लिए भी गंभीर चेतावनी है।
सबसे बड़ा सवाल अब शिक्षा विभाग की भूमिका पर खड़ा हो रहा है। यदि मान्यता समाप्त थी, शिकायतें लगातार मिल रही थीं और फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो जिम्मेदारी किसकी है? क्या विभाग को जानकारी नहीं थी, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी गईं? यह चुप्पी अब संदेह को और गहरा कर रही है।
यह मामला अब केवल एक निजी स्कूल का विवाद नहीं रह गया है। यह उस व्यवस्था का आईना बन चुका है जहां शिक्षा संस्थानों की जवाबदेही कमजोर पड़ती दिख रही है और अभिभावक खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। सवाल यह नहीं कि एक स्कूल ने क्या किया, सवाल यह है कि क्या नियम केवल छोटे संस्थानों के लिए हैं और रसूखदारों के लिए अलग व्यवस्था चलती है?
अब जरूरत केवल जांच की नहीं, बल्कि पारदर्शी और निष्पक्ष कार्रवाई की है। क्योंकि यदि शिक्षा संस्थानों में ही नियमों का मखौल उड़ने लगे, तो आने वाली पीढ़ियों को व्यवस्था पर भरोसा करना सिखाना मुश्किल हो जाएगा।


