क्राइमशिक्षा

“पढ़ाई के दबाव में टूटा मासूम हौसला: 9वीं में 78% लाने वाली जानवी ने की आत्महत्या, इस घटना ने समाज की परीक्षा व्यवस्था और सोच पर उठाए गंभीर सवाल”…

छत्तीसगढ़, कोरबा— परीक्षा में अपेक्षा से कम अंक आने की पीड़ा ने एक 14 वर्षीय छात्रा की जान ले ली। कोरबा जिले के बालको नगर क्षेत्र की रहने वाली जानवी राजपूत, कक्षा 9वीं की छात्रा थी, जिसने हाल ही में अपने वार्षिक परीक्षा में 78 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। ये प्रतिशत किसी भी औसत मानक से कम नहीं कहे जा सकते, लेकिन जानवी की उम्मीदें इससे कहीं अधिक थीं। जब अपेक्षाएं टूटीं, तो वह उस मानसिक दबाव को झेल नहीं सकी और फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

जानवी के परिजन, खासकर उसके पिता, उसकी निराशा को समझते हुए उसे संभालने की भरपूर कोशिश कर रहे थे। उन्होंने उसे प्रोत्साहित करने के लिए नए कपड़े और मिठाई भी दी, लेकिन शायद जानवी के भीतर का तूफान बहुत गहरा था। वह अपने कमरे में चली गई, और फिर बाहर नहीं आई।

इस दुखद घटना ने न केवल उसके परिवार को गहरे शोक में डुबो दिया, बल्कि समाज के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया — क्या हम बच्चों को सफलता और असफलता के बीच का फर्क सही ढंग से समझा पा रहे हैं?

हमारी शिक्षा प्रणाली या हमारी सोच?

आज की शिक्षा प्रणाली में ‘अंक’ सफलता का पैमाना बन चुके हैं। माता-पिता और शिक्षक, अक्सर अनजाने में ही बच्चों पर प्रदर्शन का ऐसा दबाव डालते हैं कि वे अपनी काबिलियत को नंबरों से तौलने लगते हैं। जानवी की तरह न जाने कितने बच्चे ऐसे बोझ के नीचे दम तोड़ देते हैं।

समाधान की दिशा में कदम

इस तरह की घटनाएं हमें चेतावनी देती हैं कि केवल रिजल्ट सुधारने से कुछ नहीं होगा, सोच सुधारनी होगी। बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संवाद ज़रूरी है। स्कूलों में काउंसलिंग को अनिवार्य किया जाना चाहिए, और माता-पिता को भी यह समझने की जरूरत है कि जीवन में ‘कम अंक’ कोई अंत नहीं होता।

संवेदनशीलता और सहानुभूति की जरूरत

जानवी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने बच्चों से क्या उम्मीद कर रहे हैं? और कहीं यह उम्मीदें उनकी जिंदगी से बड़ी तो नहीं हो गई हैं?

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