Monday, February 2, 2026
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एक घर को दो अनुकंपा, नियमों की खुलेआम धज्जियां: शिक्षा विभाग में कथित संगठित भ्रष्टाचार पर अंकित का हमला, कमिश्नर से स्वतंत्र जांच की मांग…

बिलासपुर।
शिक्षा विभाग में अनुकंपा नियुक्ति के नाम पर कथित अनियमितताओं का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। कांग्रेस नेता अंकित गौराहा ने इस पूरे प्रकरण को “संगठित भ्रष्टाचार” बताते हुए प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कमिश्नर को लिखित शिकायत सौंपकर स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है, साथ ही चेतावनी दी है कि यदि जांच ज्वाइंट डायरेक्टर शिक्षा या कमिश्नर स्तर पर नहीं कराई गई तो मामला डीपी और सचिव स्तर तक ले जाया जाएगा। जरूरत पड़ी तो आंदोलन और धरना भी किया जाएगा।

प्रेस नोट में दर्ज तथ्यों के अनुसार शिक्षा विभाग में अनुकंपा नियुक्ति के स्पष्ट नियमों को दरकिनार करते हुए एक ही परिवार की दो सगी बहनों को नियुक्ति दी गई। शिकायत में बताया गया है कि मृत कर्मचारी की पहली पत्नी की संतान यश साहू को अनुकंपा नियुक्ति दी गई, जबकि नियमों के मुताबिक एक परिवार से केवल एक ही अनुकंपा नियुक्ति मान्य होती है। इसके बावजूद बाद में दूसरी पत्नी के पुत्र को भी अनुकंपा नियुक्त कर दी गई—जो नियमों की सीधी अवहेलना मानी जा रही है।

अंकित गौराहा के अनुसार इस पूरे मामले में सिर्फ लिपिक सुनील यादव ही नहीं, बल्कि तत्कालीन और वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आरोप है कि सुनील यादव की कथित भूमिका और लेन-देन के बाद ये नियुक्तियां कराई गईं। वहीं, विजय टांडे उस समय भी और वर्तमान में भी विभागीय निर्णय प्रक्रिया के शीर्ष पर रहे हैं।

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि जिला प्रशासन के आदेश पर खुद जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा दो खंड शिक्षा अधिकारियों को जांच सौंपना, निष्पक्षता को शुरू से ही कमजोर करता है। चूंकि आरोप उसी कार्यालय और अधिकारियों से जुड़े हैं, ऐसे में अधीनस्थ अधिकारियों से जांच कराना “जांच को प्रभावित करने जैसा कदम” बताया गया है।

प्रेस नोट में यह भी उल्लेख है कि वर्ष 2021 और 2022 में नियमों के विरुद्ध पदोन्नतियां की गईं। सहायक ग्रेड-03 से सहायक ग्रेड-02 के पद पर पदोन्नति दी गई, जबकि संबंधित कर्मचारियों की पात्रता और पद स्वीकृति स्पष्ट नहीं थी। इसके बावजूद वर्षों तक वेतन आहरण कराया गया और आज तक उन पदोन्नतियों को निरस्त नहीं किया गया।

शिकायत में कहा गया है कि कार्यालयों में स्वीकृत पदों से अधिक कर्मचारियों का संलग्नीकरण किया गया, जबकि स्कूलों में शिक्षक और स्टाफ की भारी कमी बनी रही। इस प्रक्रिया में भी सुनील यादव की भूमिका बताई गई है, जिन पर पहले भी वेतन और नियुक्ति से जुड़ी अनियमितताओं के आरोप लग चुके हैं।

अंकित गौराहा ने प्रेस नोट में आरोप लगाया है कि कार्यालयों में पदस्थ शिक्षकों, बाबुओं और चपरासियों से मासिक अवैध वसूली की जाती रही—

  • शिक्षकों से 10 हजार रुपये,
  • बाबुओं से 5 हजार रुपये,
  • चपरासियों से 2 हजार रुपये प्रतिमाह
    यह वसूली कथित तौर पर पदस्थापन, संलग्नीकरण और पदोन्नति के एवज में की जाती थी।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि लोक शिक्षण संचालनालय स्तर पर पूर्व में हुई जांच में सुनील यादव दोषी पाए गए, लेकिन न तो प्रभावी दंडात्मक कार्रवाई हुई और न ही अवैध पदोन्नतियां व नियुक्तियां निरस्त की गईं। अब जबकि शिकायत में जिला शिक्षा अधिकारी का नाम भी शामिल है, उसी कार्यालय के अधीन अधिकारियों से जांच कराना गंभीर सवाल खड़े करता है।

अंकित गौराहा ने स्पष्ट किया है कि यदि निष्पक्ष, स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच नहीं कराई गई, तो वे इस मामले को राज्य स्तर तक ले जाएंगे। उनका कहना है कि यह सिर्फ अनुकंपा नियुक्ति का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग में जड़ जमाए बैठे संरक्षित भ्रष्ट तंत्र का उदाहरण है, जिसे उजागर करना बेहद जरूरी है।

अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर शिकायत पर किस स्तर की जांच कराता है और क्या शिक्षा विभाग में लंबे समय से लग रहे आरोपों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या नहीं।

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