बिलासपुर/रायपुर।
प्रदेश के बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग और भिलाई में संचालित नारायणा ई-टेक्नो स्कूल अब केवल एक निजी शिक्षण संस्था नहीं रह गया है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त खामियों, प्रशासनिक ढिलाई और संभावित भ्रष्टाचार का प्रतीक बनता जा रहा है। जिस तरह कभी डॉल्फिन स्कूल प्रकरण ने शासन-प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया था, उसी तरह की स्थिति एक बार फिर उभरती दिख रही है—फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार जिम्मेदार विभाग सब कुछ जानते हुए भी खामोश नजर आ रहा है।
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यू-डाइस पंजीयन से जुड़ा है। दस्तावेजों के अनुसार, बिलासपुर शाखा को अगस्त में मान्यता मिलने के बाद करीब 250 छात्रों का पंजीयन वहीं किया गया। वहीं, रायपुर शाखा को मान्यता नहीं मिलने के बावजूद वहां पढ़ने वाले लगभग 250 छात्रों को भी बिलासपुर के यू-डाइस में दर्ज कर दिया गया। इसका सीधा मतलब है कि रायपुर में पढ़ने वाले छात्रों को बिलासपुर की पहचान दी गई, ताकि वे परीक्षा प्रक्रिया में शामिल हो सकें। यह न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि डिजिटल सिस्टम के साथ सुनियोजित छेड़छाड़ का संकेत भी देता है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब यही छात्र रायपुर से परीक्षा देते नजर आते हैं। छात्र बिलासपुर के यू-डाइस में दर्ज हैं, लेकिन परीक्षा रायपुर से दे रहे हैं और रोल नंबर भी वहीं से जारी हो रहा है। यानी एक ही छात्र के लिए दो अलग-अलग प्रशासनिक पहचान तैयार की गई। पांचवीं बोर्ड परीक्षा के दौरान रोजाना करीब 28 छात्र बिलासपुर में अनुपस्थित दर्ज हो रहे हैं, जबकि वही छात्र रायपुर में परीक्षा दे रहे हैं। इससे साफ है कि एक ही छात्र को दो रोल नंबर जारी किए गए, जो कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
रायपुर शाखा को महज 24 दिनों की अस्थायी मान्यता दिए जाने के बाद कलेक्टर स्तर से परीक्षा की अनुमति मिलना इस पूरे मामले को और संदिग्ध बना देता है। सवाल यह उठता है कि जब छात्र पहले से बिलासपुर में पंजीकृत थे, तो उन्हें रायपुर से परीक्षा देने की अनुमति कैसे दी गई। यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं हो सकती, बल्कि इसके पीछे उच्च स्तर पर समन्वय या दबाव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
रिकॉर्ड प्रणाली भी इस मामले में कटघरे में है। यदि छात्र बिलासपुर के उपस्थिति रजिस्टर और दाखिल-खारिज रजिस्टर में दर्ज हैं, तो वे रायपुर में परीक्षा कैसे दे रहे हैं? और यदि उनका नाम वहां दर्ज ही नहीं है, तो फिर पंजीयन किस आधार पर किया गया? ये सवाल पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह खड़ा करते हैं।
मामला सामने आने के बाद जिला शिक्षा विभाग ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित जरूर की, लेकिन जांच की प्रक्रिया महज औपचारिकता बनकर रह गई। सूत्रों के अनुसार, समिति ने स्कूल का दौरा किया और लौटते वक्त यह कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि फीस और सिलेबस उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। यह बयान कार्रवाई से ज्यादा बचाव का संकेत देता है।
नारायणा ई-टेक्नो स्कूल को 9वीं से 12वीं तक की मान्यता दी गई है, वह भी आगामी सत्र से प्रभावी होनी है। इसके बावजूद कक्षा 1 से 7 तक सीबीएसई सिलेबस पढ़ाया जा रहा है, जबकि ये कक्षाएं राज्य बोर्ड के अधीन आती हैं। राज्य की पुस्तकों को लागू नहीं किया गया, लेकिन छात्रों को बोर्ड परीक्षा दिलाई जा रही है। यह स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है, जिसे जांच में नजरअंदाज कर दिया गया।
सबसे हैरानी की बात यह है कि मान्यता अगस्त में दी गई, जबकि जांच समिति जनवरी में गठित हुई। इस बीच के महीनों में क्या हुआ, किस आधार पर पंजीयन हुए और संचालन कैसे चलता रहा—इन अहम सवालों को जांच में शामिल ही नहीं किया गया। यानी सबसे महत्वपूर्ण अवधि को ही अनदेखा कर दिया गया।
हाल ही में स्कूल प्रबंधन और जिला शिक्षा विभाग के बीच बंद कमरे में बैठक भी हुई, लेकिन इसके बाद भी कोई ठोस जवाब सामने नहीं आया। विभाग ने केवल एक सामान्य दस्तावेज जारी कर जिम्मेदारी शासन पर डाल दी, जबकि असली मुद्दा मान्यता के दुरुपयोग का था।
पूरे घटनाक्रम को देखें तो यह सिर्फ लापरवाही का मामला नहीं लगता। डबल यू-डाइस, डबल रोल नंबर, बिना मान्यता संचालन और जांच में ढिलाई—ये सभी संकेत एक संगठित गड़बड़ी और संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करते हैं।
अब यह मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता और जवाबदेही पर सवाल खड़ा कर रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शासन इस पर सख्त कार्रवाई करेगा, या यह मामला भी डॉल्फिन स्कूल प्रकरण की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।


