न्यायधानी बिलासपुर में शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि ‘संगठित कारोबार’ का रूप ले चुकी है। कोयले के काले खेल से निकले कुछ रसूखदार अब मासूम बच्चों के भविष्य पर कालिख पोतने में जुट गए हैं। शहर के पॉश इलाके व्यापार विहार से लेकर अन्य हिस्सों तक, सीबीएसई के नाम पर फर्जी स्कूलों का जाल फैलाया जा चुका है—और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल में प्रशासनिक चुप्पी सबसे बड़ी साझेदार नजर आ रही है।
‘बिरला ओपन माइंड इंटरनेशनल स्कूल’ के नाम पर चल रहा कथित संस्थान इस गोरखधंधे की बानगी है। मोपका स्थित स्कूल के सीबीएसई संबद्धता कोड (333052) का इस्तेमाल कर व्यापार विहार में अवैध शाखा चलाई जा रही है। यानी एक वैध कोड की आड़ में कई ‘शिक्षा की दुकानें’ संचालित हो रही हैं। यह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सीधे तौर पर अभिभावकों के साथ धोखाधड़ी और बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सब शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की नजरों से ओझल है? या फिर सब कुछ ‘जानबूझकर’ नजरअंदाज किया जा रहा है? नोटिस, जांच और कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है। हकीकत यह है कि अवैध को वैध बनाने की ‘लीपापोती’ जारी है, और जिम्मेदार अधिकारी तमाशबीन बने हुए हैं।
छत्तीसगढ़ फीस विनियमन अधिनियम 2020 और सरकारी निर्देशों को खुलेआम ठेंगा दिखाया जा रहा है। फीस का कोई तय ढांचा नहीं, पारदर्शिता का अभाव, और अभिभावकों पर मनमानी वसूली का दबाव—यह सब इस ‘एजुकेशन सिंडिकेट’ का हिस्सा बन चुका है। स्कूलों की वेबसाइट और सूचना पटल पर फीस से जुड़ी जानकारी तक उपलब्ध नहीं है, जिससे साफ है कि ‘खेल’ पर्दे के पीछे चल रहा है।
इतना ही नहीं, छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की सस्ती और मानक किताबों को दरकिनार कर निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें जबरन थोप दी जा रही हैं। तोरवा स्थित एक निजी पुस्तकालय से सांठगांठ कर अभिभावकों की जेब पर सीधा हमला किया जा रहा है। जबकि नियम साफ कहते हैं कि किसी भी स्कूल को एक विशेष दुकान या प्रकाशक से किताबें खरीदने के लिए बाध्य करने का अधिकार नहीं है।
RTE और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों की भी खुलेआम अनदेखी हो रही है। शिक्षा के नाम पर चल रहा यह ‘मुनाफे का मॉडल’ अब बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन बन चुका है। जिस लख्मीचंद ट्रस्ट के नाम पर यह पूरा खेल चल रहा है, उसके मूल पंजीयन में प्राथमिक शिक्षा का उल्लेख तक नहीं—यानी नींव ही अवैध है।
बिलासपुर में यह कोई एक मामला नहीं है। ब्रिलिएंट, नारायणा, अचीवर्स, सेंट जेवियर और केपीएस जैसे कई नामों पर भी सीबीएसई के नाम के दुरुपयोग की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। लेकिन कार्रवाई के नाम पर ‘कागजी घोड़े’ ही दौड़ाए जाते हैं।
अब सवाल यह है—क्या प्रशासन इन ‘शिक्षा के सौदागरों’ पर सख्त कार्रवाई करेगा? या फिर यह खेल यूं ही चलता रहेगा? अगर जल्द ही कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया, तो अभिभावकों का भरोसा पूरी तरह खत्म होना तय है, और शिक्षा ‘मंडी’ में बच्चों का भविष्य यूं ही नीलाम होता रहेगा।
न्यायधानी को अब ‘ऑपरेशन क्लीन एजुकेशन’ की जरूरत है—जहां सिर्फ स्कूल नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सफाई हो।


