बिलासपुर। शिक्षा को समाज की सबसे पवित्र व्यवस्था माना जाता है, लेकिन जब इसी व्यवस्था में नियमों को ताक पर रखकर बच्चों के भविष्य से खेला जाने लगे, तो मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे सिस्टम की साख पर सवाल खड़े कर देता है। परसदा स्थित ‘मॉडर्न एंड मोरल पब्लिक स्कूल’ से जुड़ा मामला अब एक बड़े शिक्षा घोटाले का रूप लेता जा रहा है, जिसने जिला शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक निगरानी दोनों को कठघरे में ला खड़ा किया है।
जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2021 से 2024 तक इस स्कूल को केवल नर्सरी से आठवीं तक संचालन की मान्यता प्राप्त थी। इसके बावजूद स्कूल में उच्च कक्षाओं का संचालन किया जाता रहा। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि स्कूल के पास वैध CBSE संबद्धता तक नहीं थी, जबकि बिना राज्य शासन की मान्यता के किसी भी निजी विद्यालय को CBSE संबद्धता मिलना लगभग असंभव माना जाता है।
स्थिति और गंभीर तब हो गई जब वर्ष 2024 के बाद स्कूल की पूर्व मान्यता भी समाप्त हो गई और पिछले दो वर्षों से उसका नवीनीकरण तक नहीं कराया गया। इसके बावजूद स्कूल आज भी नर्सरी से लेकर 12वीं तक की कक्षाएं संचालित कर रहा है। सवाल यह है कि आखिर किसके संरक्षण में यह सब संभव हो रहा है?
सबसे बड़ा संकट उन लगभग 400 छात्रों के सामने खड़ा हो गया है, जिनका भविष्य अब अनिश्चितता में फंसता नजर आ रहा है। यदि स्कूल के पास वैध मान्यता ही नहीं है, तो यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों की परीक्षाएं किस आधार पर करवाई जा रही हैं? और यदि प्रमाणपत्र जारी भी किए जा रहे हैं, तो उनकी कानूनी वैधता क्या होगी? शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में इन दस्तावेजों को अमान्य घोषित किया गया, तो इसका सीधा असर बच्चों के उच्च शिक्षा और करियर पर पड़ेगा।
पूरे मामले में स्कूल प्रबंधन का रवैया भी कई सवाल खड़े कर रहा है। चर्चा के दौरान स्कूल के डायरेक्टर प्रेमरंजन सिंह ने कथित रूप से बार-बार अपने प्रभावशाली संबंधों का हवाला दिया और साफ शब्दों में कहा कि “हम पर कोई असर नहीं होने वाला।” यह बयान केवल अहंकार नहीं, बल्कि सिस्टम पर भरोसे के नाम पर नियमों की खुली अवहेलना जैसा प्रतीत होता है।
स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन और जिला शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से यह पूरा खेल वर्षों से चल रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि स्कूल बिना मान्यता के संचालित हो रहा था, तो विभागीय निरीक्षणों में यह तथ्य सामने क्यों नहीं आया? क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने जानबूझकर आंखें मूंद रखीं, या फिर सबकुछ किसी दबाव और संरक्षण में होता रहा?
इस पूरे प्रकरण ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए फीस भरी, भरोसा किया और सपने देखे, आज वही लोग असमंजस में हैं कि उनके बच्चों की पढ़ाई और प्रमाणपत्रों का भविष्य क्या होगा।
अब निगाहें प्रशासन और जिला शिक्षा विभाग पर टिक गई हैं। क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच होगी? क्या बिना मान्यता के स्कूल संचालन करने वालों पर कार्रवाई होगी? क्या उन अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी जिन्होंने इस अवैध व्यवस्था को फलने-फूलने दिया? या फिर हर बार की तरह यह मामला भी रसूख, दबाव और फाइलों के बोझ तले दब जाएगा?
यह केवल एक स्कूल का मामला नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में फैलती उस खतरनाक लापरवाही का उदाहरण है, जहां नियमों से ज्यादा प्रभाव और संरक्षण काम करता दिखाई देता है। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर एक गहरा धब्बा बनकर दर्ज होगा।


