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इंटरनेशनल’ नाम, प्रीमियम फीस और हाई-प्रोफाइल ब्रांडिंग के बीच बड़ा सवाल—क्या जैन इंटरनेशनल स्कूल सीबीएसई के सभी पारदर्शिता मानकों का कर रहा है पालन?…

बिलासपुर के सकरी स्थित जैन इंटरनेशनल स्कूल (TJIS) को प्रदेश के प्रतिष्ठित आवासीय विद्यालयों में गिना जाता है। विशाल कैंपस, आधुनिक हॉस्टल, स्विमिंग पूल, स्मार्ट क्लासरूम और अंतरराष्ट्रीय स्तर की ब्रांडिंग के दम पर यह संस्थान अभिभावकों के बीच एक अलग पहचान बनाने में सफल रहा है। लेकिन चमक-दमक और सुविधाओं की इस तस्वीर के पीछे कुछ ऐसे सवाल भी हैं, जो केवल एक स्कूल नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी निजी विद्यालय की सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास होता है। इसी विश्वास को बनाए रखने के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने संबद्ध विद्यालयों के लिए “मैंडेटरी पब्लिक डिस्क्लोजर” यानी अनिवार्य सार्वजनिक प्रकटीकरण की व्यवस्था बनाई है। इसके तहत हर स्कूल को अपनी वेबसाइट पर संबद्धता पत्र, राज्य शासन की एनओसी, मान्यता प्रमाणपत्र, भवन सुरक्षा प्रमाणपत्र, अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र, जल एवं स्वच्छता प्रमाणपत्र तथा फीस संरचना जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक करना अनिवार्य है।

यदि किसी विद्यालय की वेबसाइट पर ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं या अधूरे हैं, तो यह केवल तकनीकी चूक नहीं बल्कि पारदर्शिता पर गंभीर सवाल है। अभिभावक आखिर किस आधार पर भरोसा करें कि जिस संस्थान में वे अपने बच्चों का भविष्य और अपनी मेहनत की कमाई निवेश कर रहे हैं, वह सभी वैधानिक मानकों का पालन कर रहा है?

सबसे बड़ा प्रश्न फीस संरचना को लेकर खड़ा होता है। निजी विद्यालयों में फीस वृद्धि और अतिरिक्त शुल्क वसूली को लेकर देशभर में लगातार विवाद सामने आते रहे हैं। इसी वजह से सीबीएसई और राज्य सरकारों ने फीस को सार्वजनिक करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं। यदि फीस संरचना वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है, तो कई आशंकाएं जन्म लेती हैं। प्रवेश के समय एक जानकारी और बाद में अतिरिक्त शुल्क, विकास शुल्क, गतिविधि शुल्क या अन्य मदों के नाम पर अलग-अलग वसूली, तथा विभिन्न अभिभावकों से अलग-अलग शुल्क लिए जाने जैसी संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। पारदर्शिता का अभाव हमेशा संदेह को जन्म देता है।

छत्तीसगढ़ अशासकीय विद्यालय शुल्क विनियमन कानून का उद्देश्य भी यही है कि निजी विद्यालय मनमाने तरीके से शुल्क न वसूल सकें। लेकिन जब जानकारी ही सार्वजनिक नहीं होगी, तो निगरानी और जवाबदेही की प्रक्रिया प्रभावी कैसे बनेगी?

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न विद्यालय के नाम को लेकर भी है। “जैन इंटरनेशनल स्कूल” नाम सुनते ही आम अभिभावक के मन में यह धारणा बनना स्वाभाविक है कि विद्यालय किसी अंतरराष्ट्रीय बोर्ड जैसे आईबी (IB) या कैम्ब्रिज (Cambridge) से संबद्ध होगा। जबकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह एक सीबीएसई संबद्ध डे-कम-रेजिडेंशियल स्कूल है और छात्रों को सीबीएसई की ही बोर्ड परीक्षाएं देनी होती हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि “इंटरनेशनल” शब्द का उपयोग वास्तविक अंतरराष्ट्रीय संबद्धता के आधार पर किया जा रहा है या फिर यह केवल ब्रांडिंग और मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है?

निरीक्षण व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। यदि वेबसाइट पर अनिवार्य प्रकटीकरण संबंधी जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो सीबीएसई निरीक्षण के दौरान यह तथ्य सामने क्यों नहीं आया? क्या जिला शिक्षा विभाग ने कभी वेबसाइट की जांच की? क्या फीस समिति ने शुल्क संरचना का परीक्षण किया? क्या अभिभावकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई प्रभावी निगरानी की गई? या फिर प्रभावशाली निजी संस्थानों के मामले में नियमों को अलग नजरिए से देखा जाता है?

यह मामला केवल एक विद्यालय तक सीमित नहीं है। यह पूरे नियामक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। यदि कोई छोटा निजी विद्यालय किसी दस्तावेज की कमी पर नोटिस और कार्रवाई का सामना कर सकता है, तो बड़े और प्रभावशाली संस्थानों के लिए वही सख्ती क्यों दिखाई नहीं देती? कानून का उद्देश्य सभी के लिए समान होना चाहिए और शिक्षा के क्षेत्र में प्रभाव, प्रतिष्ठा और आर्थिक शक्ति कभी भी नियमों से ऊपर नहीं हो सकती।

यदि विद्यालय सभी नियमों का पालन कर रहा है, तो उसे अपने सभी वैधानिक दस्तावेज और फीस संरचना सार्वजनिक कर पारदर्शिता का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। वहीं यदि कहीं कोई कमी है, तो सीबीएसई, जिला शिक्षा अधिकारी, कलेक्टर और राज्य शासन को निष्पक्ष जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

क्योंकि सवाल केवल एक स्कूल का नहीं है। सवाल यह है कि क्या प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था नियमों और जवाबदेही के आधार पर संचालित होगी या फिर प्रभाव और प्रतिष्ठा के दबाव में? जब दस्तावेज सार्वजनिक न हों, फीस स्पष्ट न हो और जिम्मेदार विभाग मौन दिखाई दें, तब सवाल उठाना केवल अधिकार नहीं बल्कि लोकतंत्र और समाज दोनों के प्रति जिम्मेदारी बन जाता है। शिक्षा के मंदिरों में पारदर्शिता की रोशनी जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी उन सवालों की आवाज भी है जो बच्चों के भविष्य और अभिभावकों के विश्वास की रक्षा करती है।

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