
बिलासपुर/तखतपुर। ग्राम लाखासार में सामाजिक बहिष्कार, शासकीय भूमि पर कथित अतिक्रमण और बेदखली की कार्रवाई को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। एक तरफ रमेश चंदेल और उनके परिवार ने सतनामी समाज पर सामाजिक बहिष्कार कर हुक्का-पानी बंद करने तथा दुर्भावनापूर्वक मकान-दुकान हटवाने का दबाव बनाने का आरोप लगाया है, तो दूसरी तरफ समाज की ओर से शासकीय भूमि पर कथित अवैध कब्जे को हटाने की मांग किए जाने की बात सामने आई है। अब यह विवाद केवल जमीन के एक टुकड़े तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता, सामाजिक सद्भाव और आम नागरिक के अधिकारों से जुड़े गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
रमेश चंदेल, पिता शिवचरण, निवासी ग्राम लाखासार ने कलेक्टर बिलासपुर के जनदर्शन में शिकायत प्रस्तुत कर मामले में हस्तक्षेप और न्याय की मांग की है। शिकायत में लगाए गए आरोपों के अनुसार, विवाद की शुरुआत वर्ष 2020 में कोरोना लॉकडाउन के दौरान उनके चाचा पंचराम के निधन के बाद हुई थी। आवेदक का कहना है कि उस समय शासन की कोरोना संबंधी पाबंदियों के कारण अंतिम संस्कार में सीमित लोगों को शामिल करने की व्यवस्था थी। इसके बावजूद परिवार पर मृत्यु भोज कराने का दबाव बनाया गया। परिवार द्वारा ऐसा करने से इनकार किए जाने के बाद कथित तौर पर सामाजिक बहिष्कार की स्थिति पैदा कर दी गई।
आवेदक का आरोप है कि इसके बाद उनके परिवार को सामाजिक स्तर पर प्रताड़ित किया गया और सामान्य सामाजिक व्यवहार से अलग-थलग करने की कोशिश की गई। यदि शिकायत में लगाए गए ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल ग्रामीण आपसी विवाद नहीं, बल्कि किसी परिवार पर सामाजिक दबाव बनाने और उसके नागरिक अधिकारों को प्रभावित करने का गंभीर विषय बन सकता है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और दूसरे पक्ष का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी आवश्यक है।
विवाद का दूसरा और सबसे अहम पहलू शासकीय भूमि खसरा नंबर 1331/2 से जुड़ा है। रमेश चंदेल का दावा है कि उनका परिवार पिछले करीब 25 वर्षों से इस जमीन के एक हिस्से पर टीन शेड लगाकर दुकान चला रहा है, जबकि कुछ हिस्से में आवासीय मकान भी बना हुआ है। परिवार का आरोप है कि अब इसी दुकान और मकान को हटाने के लिए बेदखली की कार्रवाई की जा रही है।
आवेदक पक्ष ने तहसीलदार तखतपुर की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि मामले के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच किए बिना उनके विरुद्ध बेदखली का आदेश जारी कर दिया गया। परिवार का कहना है कि लंबे समय से वहां दुकान और मकान होने के बावजूद अब अचानक कार्रवाई से उनके सामने रोजी-रोटी और आवास का संकट खड़ा हो गया है।
लेकिन इस विवाद में दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, सतनामी समाज और अन्य ग्रामीणों की ओर से यह आरोप लगाया गया है कि संबंधित शासकीय भूमि पर सतनाम भवन और जय स्तंभ का निर्माण कराया गया था। समाज की शिकायत में रमेश चंदेल और रमेश शर्मा पर भवन के बगल में कथित रूप से अवैध कब्जा कर दुकान बनाने का आरोप लगाया गया है। समाज का दावा है कि इससे सतनाम भवन में सामाजिक एवं सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित करने में परेशानी होती है।
यानी एक ही सरकारी जमीन को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। एक पक्ष वर्षों से दुकान-मकान होने और कथित भेदभाव का सवाल उठा रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर अतिक्रमण हटाने की मांग कर रहा है। ऐसे में किसी भी पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मानने के बजाय राजस्व अभिलेखों, सीमांकन, निर्माण की स्थिति और पूर्व में हुई कार्रवाई की निष्पक्ष जांच ही विवाद का समाधान निकाल सकती है।
शिकायत से संबंधित उपलब्ध विवरण में राजस्व जांच का भी उल्लेख है। बताया गया है कि हल्का पटवारी ने मौके पर पहुंचकर जांच की थी। जांच के दौरान शासकीय भूमि पर निर्माण और अतिक्रमण से संबंधित तथ्य सामने आने की बात कही गई है। प्रतिवेदन में जय स्तंभ और सतनाम भवन के निर्माण को लेकर भी अतिक्रमण का उल्लेख होने का दावा किया गया है।
विवरण के अनुसार, मौके पर जांच के दौरान 50 से 100 लोगों की भीड़ जुटने, शासकीय कार्य में बाधा डालने तथा दस्तावेजों के साथ झूमाझटकी किए जाने जैसी स्थिति बनने की बात भी सामने आई थी। इसकी सूचना तहसीलदार और अनुविभागीय अधिकारी को दिए जाने तथा बाद में राजस्व टीम और पुलिस बल भेजे जाने का उल्लेख है।
यदि जांच में एक से अधिक निर्माणों को लेकर अतिक्रमण की स्थिति सामने आई है, तो प्रशासन के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है कि किस निर्माण की वैधानिक स्थिति क्या है और किस आधार पर कार्रवाई तय की गई। क्या सभी संबंधित पक्षों को समान अवसर देकर सुनवाई की गई? क्या पूरे खसरे का निष्पक्ष सीमांकन कराया गया? क्या निर्माणों की स्थिति और भूमि के उपयोग को लेकर अलग-अलग आदेश पारित किए गए? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने से विवाद की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
हालांकि, उपलब्ध विवरण के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि प्रशासन ने निश्चित रूप से एकतरफा कार्रवाई की है। इसकी पुष्टि के लिए बेदखली आदेश, राजस्व जांच प्रतिवेदन, संबंधित पक्षों के आवेदन और भूमि के अभिलेखों का परीक्षण आवश्यक है।
लाखासार प्रकरण में सबसे गंभीर सवाल यही है कि क्या जमीन से जुड़े विवाद पर सामाजिक मतभेद हावी हो रहे हैं? रमेश चंदेल के परिवार का आरोप है कि मृत्यु भोज को लेकर पैदा हुए पुराने विवाद के बाद उन्हें सामाजिक रूप से अलग-थलग किया गया और अब उनकी दुकान-मकान पर कार्रवाई के जरिए दबाव बनाया जा रहा है। दूसरी ओर, समाज की ओर से कथित अतिक्रमण हटाने की मांग को सार्वजनिक और सामुदायिक उपयोग की भूमि से जुड़ा मामला बताया गया है।
इन दोनों पहलुओं की जांच अलग-अलग और निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए। यदि जमीन पर अतिक्रमण हुआ है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन यदि किसी परिवार को सामाजिक विवाद के कारण निशाना बनाया जा रहा है, तो उस शिकायत की भी गंभीरता से जांच होनी चाहिए। किसी भी पक्ष को सामाजिक प्रभाव, भीड़ या दबाव के आधार पर कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
प्रशासन की जिम्मेदारी केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं है। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कार्रवाई कानून, राजस्व अभिलेखों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप हो तथा किसी भी परिवार के साथ भेदभाव न हो। इसी तरह, किसी सामुदायिक भवन या सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर वैधानिक अधिकारों के विपरीत कब्जा पाया जाता है, तो उसके संबंध में भी कानून के अनुसार निर्णय लिया जाना चाहिए।
मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया, जब शिकायतकर्ता परिवार ने कथित अन्याय और आर्थिक-मानसिक प्रताड़ना का हवाला देते हुए चेतावनी दी कि यदि उनके मकान और दुकान को तोड़ा गया तथा उन्हें न्याय नहीं मिला, तो वे कलेक्ट्रेट परिसर में आत्मदाह जैसा कदम उठाने को मजबूर हो सकते हैं।
यह चेतावनी प्रशासन के लिए गंभीर संकेत है। किसी भी शिकायतकर्ता की ऐसी बात को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। संबंधित अधिकारियों को परिवार से तत्काल संपर्क कर उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने, तनाव कम करने और विवाद के समाधान के लिए समयबद्ध प्रक्रिया अपनाने की जरूरत है। साथ ही, शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच कानून के दायरे में की जानी चाहिए।
आत्मदाह की चेतावनी किसी भी विवाद का समाधान नहीं है। इससे जान का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है और परिवार की परेशानी और बढ़ सकती है। इसलिए प्रशासन को शिकायतकर्ता की सुरक्षा और उसकी बात सुने जाने की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि मामला किसी अप्रिय घटना तक न पहुंचे।
लाखासार का यह विवाद अब जिला प्रशासन के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है। जरूरत इस बात की है कि संबंधित भूमि का निष्पक्ष सीमांकन कराया जाए, खसरा नंबर 1331/2 से जुड़े राजस्व दस्तावेजों की जांच हो, बेदखली आदेश के आधार की समीक्षा की जाए और रमेश चंदेल के परिवार सहित सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।
सामाजिक बहिष्कार के आरोपों की अलग से जांच कर यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि क्या किसी परिवार पर मृत्यु भोज को लेकर अनुचित दबाव बनाया गया था या उसे सामाजिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश हुई थी। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इसी तरह, यदि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा प्रमाणित होता है, तो संबंधित निर्माणों के मामले में कानून के मुताबिक निर्णय लिया जाना चाहिए।
ग्राम लाखासार का विवाद प्रशासन के लिए केवल अतिक्रमण हटाने की फाइल नहीं होना चाहिए। यह मामला सामाजिक सद्भाव, राजस्व कानून के पालन और प्रशासन पर लोगों के भरोसे से भी जुड़ा है। निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि जमीन पर वास्तविक स्थिति क्या है, सामाजिक बहिष्कार के आरोपों में कितनी सच्चाई है और बेदखली की कार्रवाई उचित प्रक्रिया के तहत हो रही है या नहीं।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। क्या शिकायतकर्ता परिवार को निष्पक्ष सुनवाई मिलेगी? क्या शासकीय भूमि से जुड़े सभी निर्माणों की स्थिति स्पष्ट की जाएगी? और क्या सामाजिक विवाद को कानून के दायरे में सुलझाकर किसी संभावित अप्रिय घटना को रोका जा सकेगा? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि लाखासार विवाद का समाधान न्यायपूर्ण तरीके से निकलता है या मामला और गहराता है।

