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छत्तीसगढ़ के इस गांव के लोग मना रहे दिवाली, आज भाई दूज-मातर पर्व, सैकड़ों सालों हर त्योहार एक हफ्ते पहले ही मनाते हैं ग्रामीण…

गांव में सबसे पहले सिरदार देव की पूजा अर्चना करते हैं, उसके बाद ग्रामीण त्योहार मनाते हैं। दीपावली त्योहार मनाने सगे संबंधी और रिश्तेदार भी आएं हैं...

पूरे देश में दीपावली को लेकर उत्साह का माहौल है। 24 अक्टूबर को लक्ष्मी पूजा से त्योहार की शुरुआत हो रही है। दीपोत्सव की खुशियों को सेलिब्रेट करने की तैयारियां चल रही हैं। कोई खरीदारी की योजना बना रहा है तो कुछ लोगों ने खरीदी शुरू भी कर दी है। व्यापारी भी अच्छी ग्राहकी की उम्मीद संजोए बैठे हैं। हर कोई इस दिवाली को खास अंदाज में मनाना चाहता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के एक गांव में 18 अक्टूबर से दिवाली की शुरुआत हो गई है। मंगलवार को लक्ष्मी पूजा, बुधवार को गोवर्धन पूजा और गुरुवार को भाई-दूज और मातर त्योहार गांव के लोग मना रहे हैं। दिवाली को लेकर पूरे गांव में उत्साह का माहौल है।

12 सौ की आबादी वाले धमतरी जिले के सेमरा सी गांव की पूरे प्रदेश में अलग पहचान है। यहां हर त्योहार एक सप्ताह पहले ही मना लिया जाता है। गांव के कामता प्रसाद निषाद ने बताया कि हम सभी गांव वाले परंपरा के अनुसार हर साल निर्धारित तिथि से एक सप्ताह पहले ही दीपावली मना लेते हैं। इस बार 18 अक्टूबर को दीपावली, 19 अक्टूबर को गोवर्धन पूजा का कार्यक्रम हुआ। गुरुवार 20 अक्टूबर को भाई-दूज और मातर का कार्यक्रम है। शाम को सांस्कृतिक और लोक परंपरा के हिसाब से कार्यक्रम होंगे। गांव में सबसे पहले सिरदार देव की पूजा अर्चना करते हैं, उसके बाद ग्रामीण त्योहार मनाते हैं। दीपावली त्योहार मनाने सगे संबंधी और रिश्तेदार भी आएं हैं। पूरे गांव में दीपोत्सव को लेकर उत्साह का माहौल है।

वर्षों से चली आ रही परंपरा, गांव के लोग निभा रहे
गजेंद्र सिन्हा ने बताया कि गांव में दीपावली, दशहरा, होली और पोला पर्व भी एक सप्ताह पहले ही मनाया जाता है। गांव में सैकड़ों साल पहले एक बुजुर्ग आया था, जो यहीं बस गया। उनका नाम सिरदार था। उनके कहने पर ही प्रमुख त्योहारों को तय तिथि से एक सप्ताह पहले मनाने की शुरुआत की गई है। गांव में सिरदार की ग्राम देवता के रूप में पूजा की जाती है। पूर्वजों से सुनते आ रहे हैं कि ग्राम देवता ने गांव के मुखिया, बैगा को सपने में आकर कहा था कि गांव में त्योहार सात दिन पहले ही मनाया जाए, वरना विपदा आ सकती है। इसके बाद से यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस परंपरा को गांव के लोग आज भी निभा रहे हैं। त्योहार में दूसरे गांव के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल होने आते हैं।