बिलासपुर में नगरीय निकाय चुनाव के नामांकन प्रक्रिया के अंतिम दिन कांग्रेस पार्टी के अंदर गहराए मतभेद और बगावत के स्वर मुखर हो गए। पार्टी के दो प्रमुख नेता, राष्ट्रीय महासचिव ओबीसी विभाग के त्रिलोक श्रीवास और वार्ड नंबर 32 के पूर्व पार्षद तैय्यब हुसैन, ने कांग्रेस नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

त्रिलोक श्रीवास का तीखा तेवर
त्रिलोक श्रीवास ने कांग्रेस के जिला अध्यक्ष विजय केसरवानी पर भाजपा के एजेंट होने का आरोप लगाया। उन्होंने कलेक्ट्रेट में अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ पहुंचकर बगावत का ऐलान करते हुए कहा कि जिला अध्यक्ष पार्टी के हितों के बजाय अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर रहे हैं।
त्रिलोक ने यह भी कहा, “मुझे अब भी पार्टी पर भरोसा है, लेकिन अगर मुझे बी-फॉर्म नहीं दिया गया तो समर्थकों से सलाह लेकर आगे की रणनीति तय करूंगा।” त्रिलोक ने महापौर पद के लिए अपनी दावेदारी जताई थी, लेकिन पार्टी में उन्हें उचित तवज्जो नहीं मिली, जिससे वे आहत नजर आए।

तैय्यब हुसैन का गुस्सा और गुटबाजी के आरोप
वहीं, कांग्रेस के पूर्व पार्षद तैय्यब हुसैन ने पार्टी में गहराई गुटबाजी और नेतृत्व की विफलता को लेकर खुलकर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस जिला अध्यक्ष विजय पांडेय गुटबाजी खत्म करने के बजाय अपने अलग गुट का निर्माण कर रहे हैं।
तैय्यब ने विजय पांडेय को निकम्मा बताते हुए आरोप लगाया कि वे पार्टी को मजबूत करने में नाकाम रहे हैं। उनका कहना है कि गुटबाजी के चलते कांग्रेस का आधार कमजोर हो रहा है और कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ रहा है।
कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण समय
यह बगावत कांग्रेस के लिए नगरीय निकाय चुनाव में बड़ी चुनौती बन सकती है। दोनों नेताओं के बगावती तेवर पार्टी के आंतरिक संकट को उजागर कर रहे हैं। जहां त्रिलोक श्रीवास और तैय्यब हुसैन के बयानों ने स्थानीय नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं इससे पार्टी की छवि को भी नुकसान हो सकता है।
स्थानीय नेतृत्व की परीक्षा
विजय केसरवानी और विजय पांडेय जैसे नेताओं पर पार्टी को एकजुट रखने और चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की जिम्मेदारी है। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह स्पष्ट है कि पार्टी के अंदर गहराए मतभेदों को दूर करना उनके लिए आसान नहीं होगा।
क्या होगा बागियों का फैसला?
त्रिलोक श्रीवास और तैय्यब हुसैन जैसे नेताओं के कदम कांग्रेस के लिए आगामी चुनाव में बड़ा मोड़ साबित हो सकते हैं। अगर पार्टी समय रहते इन असंतुष्ट नेताओं को मनाने में असफल रहती है, तो यह उनके चुनावी परिणामों पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस नेतृत्व इन विवादों को कैसे संभालता है और बागी नेताओं को पार्टी की मुख्यधारा में लाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।


