बिलासपुर में आयोजित जनदर्शन उस वक्त एक सामान्य जनसुनवाई नहीं रहा, जब भीड़ के बीच से उठी एक फरियाद ने पूरी व्यवस्था को आईना दिखा दिया। दिल्ली प्रवास से लौटे केंद्रीय मंत्री तोखन साहू जब 27 खोली स्थित अपने कार्यालय में लोगों की समस्याएं सुन रहे थे, तभी एक पीड़ित परिवार अपनी आखिरी उम्मीद लेकर सामने पहुंचा—और माहौल अचानक बदल गया।
यह कहानी 23 वर्षीय महावीर उजागर की है, जो 29 मार्च को पहली बार मजदूरी के लिए घर से निकला था। लेकिन यह कदम उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल देगा, इसका उसे अंदाजा नहीं था। भरारी थाना क्षेत्र में निर्माण कार्य के दौरान वह 33 केवी हाईटेंशन लाइन की चपेट में आ गया। हादसा इतना भीषण था कि डॉक्टरों को उसकी जान बचाने के लिए दोनों हाथ काटने पड़े, और अब एक पैर भी काटने की तैयारी चल रही है।
इस दर्दनाक घटना ने एक युवक का भविष्य ही नहीं, बल्कि एक पूरे परिवार की उम्मीदों को भी तोड़ दिया। इलाज में अब तक 8 से 10 लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार ने जमीन तक बेच दी, लेकिन न तो आयुष्मान योजना का लाभ मिल सका और न ही समय पर कोई सरकारी सहायता मिली।
मामला जब जनदर्शन में पहुंचा, तो तोखन साहू ने इसे सामान्य शिकायत की तरह नहीं लिया। उन्होंने मौके पर ही बिजली विभाग के अधिकारियों को तलब किया, लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताई और स्पष्ट जवाब मांगा कि इतने बड़े हादसे के बाद भी इलाज और मुआवजे की व्यवस्था क्यों नहीं हुई। साथ ही स्वास्थ्य विभाग से सीधे बात कर महावीर को तत्काल बेहतर इलाज के लिए रायपुर रेफर कराया और आश्वासन दिया कि इलाज में किसी भी तरह की कमी नहीं रहने दी जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम में जिला पंचायत सदस्य भारती माली की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने बताया कि पीड़ित परिवार पहले ही कलेक्टर और कमिश्नर तक गुहार लगा चुका था, लेकिन कहीं से ठोस मदद नहीं मिली। ऐसे में वे खुद परिवार को जनदर्शन लेकर पहुंचीं और पूरे मामले को मजबूती से सामने रखा। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि जिम्मेदारों की लापरवाही का परिणाम है और जब तक परिवार को न्याय और आर्थिक सहारा नहीं मिलेगा, यह लड़ाई जारी रहेगी।
घटना के बाद सामने आई संवेदनहीनता ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। परिजनों के अनुसार, बिजली विभाग ने मदद के बजाय विकलांगता प्रमाण पत्र लाने की बात कही। जब कोई व्यक्ति जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा हो, तब इस तरह की प्रक्रिया व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है।
वहीं फार्म हाउस संचालक का यह कहना कि परिवार ने मदद नहीं मांगी, इसलिए उन्होंने सहयोग नहीं किया, इस पूरे मामले को और कठोर बनाता है। ऐसी स्थिति में मदद मांगने की नहीं, बल्कि समझने की जरूरत होती है।
2 अप्रैल को एफआईआर दर्ज होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। ठेकेदार और अन्य जिम्मेदारों की जवाबदेही तय नहीं होना प्रशासनिक ढिलाई को उजागर करता है।
आज महावीर उजागर सिर्फ एक मरीज नहीं, बल्कि अपनी मां की आखिरी उम्मीद है। पिता का साया पहले ही उठ चुका है और अब बेटा जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहा है। मां की आंखों में एक ही सवाल है—क्या उसका बेटा बच पाएगा?
महावीर की यह कहानी केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनशीलता की परीक्षा है। एक तरफ मंत्री स्तर पर त्वरित कार्रवाई, दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर लापरवाही—यह विरोधाभास साफ बताता है कि व्यवस्था में अभी भी बहुत कुछ बदलने की जरूरत है। अब यह देखना होगा कि यह मामला सिर्फ सहानुभूति तक सीमित रहता है या वास्तव में जिम्मेदारों को जवाबदेह ठहराया जाता है।


