बिलासपुर सेंट्रल जेल में विचाराधीन बंदी नीलू जगत की हत्या ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब सिर्फ पुलिस जांच से नहीं, बल्कि पूरे जेल तंत्र को देना होगा।
जेल… वह जगह जहां अपराधियों को कानून के दायरे में रखकर सुधारने की बात की जाती है। लेकिन अगर उसी जेल के भीतर किसी बंदी का सिर कुचलकर कत्ल कर दिया जाए, तो यह सिर्फ एक हत्या नहीं बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की भयावह विफलता बन जाती है।
सोमवार सुबह बिलासपुर सेंट्रल जेल के ई-1 बैरक में जो हुआ, उसने जेल प्रशासन के तमाम दावों की पोल खोल दी। विचाराधीन बंदी नीलू जगत पर एक ऐसे कैदी ने हमला किया, जो पहले से तीन हत्याओं और दो हत्या के प्रयास के मामलों में सजा काट रहा है। सवाल यह है कि आखिर इतना खतरनाक अपराधी सामान्य बंदियों के बीच कैसे रखा गया था? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि उसके हाथ में ऐसा भारी सीमेंट का ढक्कन पहुंचा कैसे, जो किसी की जान लेने के लिए पर्याप्त हथियार बन गया?
जेल प्रशासन अक्सर सुरक्षा, निगरानी और बंदियों के वर्गीकरण की बात करता है। लेकिन नीलू जगत की मौत बता रही है कि कागजों में मौजूद व्यवस्थाएं जमीन पर कितनी कमजोर हैं। यदि एक हाई-रिस्क कैदी बैरक के भीतर खुलेआम हमला कर सकता है, तो फिर जेल के भीतर मौजूद सीसीटीवी, प्रहरी और निगरानी तंत्र किस काम के हैं?
इस मामले का दूसरा चिंताजनक पहलू यह है कि मृतक नीलू जगत कोई सजायाफ्ता अपराधी नहीं था। वह विचाराधीन बंदी था, यानी कानून की नजर में तब तक दोषी नहीं माना जा सकता था जब तक अदालत उसे दोषी साबित न कर दे। ऐसे व्यक्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह राज्य और जेल प्रशासन की थी। लेकिन वह जिम्मेदारी उसकी जान के साथ खत्म हो गई।
यह भी जांच का विषय है कि क्या दोनों बंदियों के बीच पहले से कोई विवाद था? क्या जेल प्रशासन को किसी संभावित तनाव की जानकारी थी? यदि थी, तो उसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए? और यदि नहीं थी, तो यह खुफिया निगरानी की विफलता है।
देश की जेलों में अक्सर क्षमता से अधिक कैदी, स्टाफ की कमी और निगरानी में लापरवाही की शिकायतें सामने आती रही हैं। लेकिन हर घटना के बाद जांच और रिपोर्ट की औपचारिकता पूरी कर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि कुछ समय बाद फिर किसी जेल से हिंसा, हत्या या आत्महत्या की खबर सामने आ जाती है।
बिलासपुर सेंट्रल जेल की यह घटना भी सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जो सलाखों के भीतर बंद लोगों की सुरक्षा तक सुनिश्चित नहीं कर पा रही। अगर जेल के अंदर एक विचाराधीन बंदी की जान सुरक्षित नहीं है, तो फिर सुधार गृह और सुरक्षा के तमाम दावे खोखले नजर आते हैं।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नीलू जगत की हत्या किसने की। असली सवाल यह है कि उसकी हत्या होने कैसे दी गई?
जब तक इस प्रश्न का जवाब तय नहीं होगा और जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह माना जाएगा कि नीलू जगत की मौत सिर्फ एक कैदी की हत्या नहीं, बल्कि जेल प्रशासन की चूक से हुई एक संस्थागत हत्या है।


