बिलासपुर। पहली ही मूसलाधार बारिश ने बिलासपुर स्मार्ट सिटी के चमकदार दावों की चमक धो दी। जिस शहर को 1080 करोड़ रुपये की परियोजना के जरिए आधुनिक ड्रेनेज, बेहतर जल निकासी और विश्वस्तरीय शहरी सुविधाओं का मॉडल बताया गया था, वही शहर कुछ घंटों की बारिश में तालाब बन गया। सड़कें नदियों में बदल गईं, निचली बस्तियां जलमग्न हो गईं, घरों में घुटनों तक पानी भर गया और कई इलाकों में ट्रांसफार्मर पानी से घिर जाने के कारण लोगों में करंट का भय बना रहा।
लेकिन इस पूरे संकट के बीच एक तस्वीर सबसे ज्यादा चर्चा में रही। जब आम नागरिक अपने घरों से बाल्टी और डिब्बों से पानी निकालने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब नगर निगम की सबसे बड़ी प्राथमिकता शहर नहीं, बल्कि नगर निगम कमिश्नर प्रकाश सर्वे का सरकारी बंगला नजर आया।
हाई हॉर्स पावर पंप, भारी मोटर, ट्रक और नगर निगम के तमाम संसाधन कमिश्नर के सरकारी आवास के सामने तैनात कर दिए गए। सफाई व्यवस्था के प्रभारी एवं जोन कमिश्नर प्रवेश कश्यप खुद छाता लेकर मौके पर डटे रहे और पूरे ऑपरेशन की निगरानी करते रहे। सवाल यह नहीं कि सरकारी आवास से पानी क्यों निकाला गया, सवाल यह है कि जब पूरा शहर डूब रहा था, तब सबसे ज्यादा प्रशासनिक ताकत आखिर एक वीआईपी आवास पर ही क्यों केंद्रित रही?
यह दृश्य केवल जलभराव का नहीं था, बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकताओं का आईना भी था। शहर के कई वार्ड मदद का इंतजार करते रहे, लेकिन वहां वैसी तत्परता नजर नहीं आई जैसी कमिश्नर के बंगले पर दिखाई दी।
विडंबना यह है कि नगर निगम हर महीने लगभग चार करोड़ रुपये सफाई व्यवस्था पर खर्च करने का दावा करता है। मुख्य सड़कों और गलियों की सफाई का जिम्मा लायंस कंपनी के पास है, जबकि नालियों की सफाई और कचरा प्रबंधन रामकी कंपनी को सौंपा गया है। करोड़ों रुपये के नियमित भुगतान के बावजूद पहली ही तेज बारिश में नालियां उफन गईं, सड़कें तालाब बन गईं और जल निकासी पूरी तरह ध्वस्त दिखाई दी।
अब सबसे बड़ा सवाल उन अधिकारियों से है जिनके जिम्मे पूरे शहर की सफाई, नालों की निगरानी और जल निकासी व्यवस्था है। यदि नाला सफाई अभियान सफल था तो पहली बारिश में पूरा सिस्टम क्यों बैठ गया? यदि करोड़ों रुपये सही तरीके से खर्च हुए, तो कमिश्नर का सरकारी आवास तक जलभराव से क्यों नहीं बच सका? जब प्रशासन का अपना घर सुरक्षित नहीं रह पाया, तो आम नागरिकों की सुरक्षा का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?
हर वर्ष मानसून से पहले नाला सफाई अभियान चलाने, गाद निकालने और जल निकासी को दुरुस्त करने के दावे किए जाते हैं। लेकिन पहली ही बारिश ने साबित कर दिया कि या तो तैयारी कागजों में थी, या फिर निगरानी व्यवस्था पूरी तरह विफल रही। नालियां कचरे से पट गईं, पानी सड़कों पर फैल गया और शहर का यातायात अस्त-व्यस्त हो गया।
1080 करोड़ रुपये की स्मार्ट सिटी परियोजना पर वर्षों तक काम चला। शहर को आधुनिक बनाने के बड़े-बड़े वादे किए गए। लेकिन आज जनता पूछ रही है कि आखिर वह स्मार्ट ड्रेनेज सिस्टम कहां है? वे आधुनिक जल निकासी परियोजनाएं कहां हैं जिनके नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए? यदि हर साल बारिश में यही हाल होना है, तो फिर स्मार्ट सिटी का दर्जा आखिर किस बात का?
यह मामला अब केवल जलभराव तक सीमित नहीं रह गया है। यह सार्वजनिक धन के उपयोग, कार्यों की गुणवत्ता, ठेकेदार एजेंसियों की जवाबदेही और प्रशासनिक निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। जिन एजेंसियों को सफाई और नाला प्रबंधन का जिम्मा दिया गया, उनके कार्यों का मूल्यांकन कैसे हुआ? क्या कभी उनका स्वतंत्र ऑडिट कराया गया? यदि काम संतोषजनक था, तो शहर बार-बार क्यों डूब रहा है?
जनता अब तस्वीरें नहीं, जवाब चाहती है। वह जानना चाहती है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हर मानसून में वही संकट क्यों दोहराया जाता है। वह यह भी जानना चाहती है कि संकट की घड़ी में प्रशासन की पहली जिम्मेदारी पूरे शहर की होती है या केवल वीआईपी आवासों की।
पहली बारिश ने एक दिन में स्मार्ट सिटी के दावों, सफाई व्यवस्था के दावों और करोड़ों रुपये के खर्च की वास्तविकता सामने ला दी है। अब समय केवल नई घोषणाओं का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। यदि विफलताओं पर कार्रवाई नहीं हुई, तो हर मानसून के साथ यही सवाल फिर उठेगा—क्या बिलासपुर सचमुच स्मार्ट सिटी है, या सिर्फ कागजों में बनाई गई एक महंगी परिकल्पना?


