बिलासपुर, 19 मार्च 2026।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मीसा बंदी सम्मान निधि मामले में एक अहम और स्पष्ट संदेश देने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि आपातकाल के दौरान जेल जाना मात्र इस योजना का लाभ पाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। यदि आवेदक का आपराधिक रिकॉर्ड है, तो उसे इस सम्मान निधि का पात्र नहीं माना जाएगा।
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी कोर्ट ने रायपुर निवासी रामगुलाम सिंह ठाकुर की अपील पर सुनवाई करते हुए की। याचिकाकर्ता ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण सम्मान निधि के तहत लाभ पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
मामले की सुनवाई करते हुए डिवीजन बेंच (डीबी) ने पहले दिए गए सिंगल बेंच के आदेश को सही ठहराया और अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इस योजना का उद्देश्य सिर्फ उन लोगों को आर्थिक सहायता देना नहीं है, जो आपातकाल के दौरान जेल गए थे, बल्कि यह उन व्यक्तियों के सम्मान के लिए है जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया और जिनका आचरण भी समाज के लिए प्रेरणादायक रहा।
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति का आपराधिक रिकॉर्ड उसके चरित्र और सामाजिक छवि पर सवाल खड़ा करता है। ऐसे में केवल जेल जाने के आधार पर उसे सम्मान निधि का पात्र नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस योजना का मूल उद्देश्य लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्ष करने वाले और समाज में सकारात्मक योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करना है।
गौरतलब है कि मीसा (Maintenance of Internal Security Act) के तहत आपातकाल के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। बाद में विभिन्न राज्य सरकारों ने ऐसे बंदियों को सम्मानित करने और आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए योजनाएं शुरू कीं, जिनमें यह सम्मान निधि प्रमुख है।
इस फैसले को भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है, जिससे स्पष्ट होगा कि सम्मान निधि का लाभ केवल पात्र और निष्कलंक छवि वाले व्यक्तियों को ही मिलेगा।


