बिलासपुर की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में खड़ी है। लंबे समय से चल रहे निजी स्कूलों के अनियमित संचालन के बीच अब एक नाम तेजी से सुर्खियों में है—बिरला ओपन इंटरनेशनल स्कूल। आरोप गंभीर हैं, संकेत उससे भी ज्यादा चिंताजनक। कागजों में सीमित अनुमति, लेकिन जमीन पर व्यापक विस्तार—और इसी अंतर ने पूरे सिस्टम की परतें खोलनी शुरू कर दी हैं।
दस्तावेज बताते हैं कि संस्थान को केवल कक्षा 1 से 8 तक अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई की अनुमति दी गई। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आती है। नर्सरी से लेकर 12वीं तक कक्षाएं संचालित हो रही हैं। सवाल सीधा है—जब अनुमति सीमित है, तो सीनियर सेकेंडरी स्तर तक पढ़ाई किस आधार पर? क्या यह खुला उल्लंघन है या नियमों को दरकिनार करने का एक स्थापित तरीका?
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। स्कूल का संचालन जिस ट्रस्ट के जरिए किया जा रहा है, उसके घोषित उद्देश्य चिकित्सा सेवाओं से जुड़े हैं—दंत चिकित्सा, फिजियोथेरेपी और पैरामेडिकल शिक्षा। यानी शिक्षा (स्कूल स्तर) इस ट्रस्ट के मूल उद्देश्य में शामिल ही नहीं। ऐसे में नर्सरी से 12वीं तक स्कूल चलाना केवल विस्तार नहीं, बल्कि उद्देश्य और गतिविधि के बीच गंभीर विरोधाभास है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ट्रस्ट की आड़ में कुछ और खेल खेला जा रहा है?
जमीनी हकीकत और भी उलझी हुई है। मोंपका में नर्सरी से 12वीं तक कक्षाएं, वहीं व्यापार विहार में अलग से संचालन और प्रबंधन—एक ही संस्थान, दो लोकेशन, अलग-अलग गतिविधियां। क्या इसके लिए अलग-अलग मान्यता ली गई? या फिर एक ही अनुमति को कई जगहों पर फैलाकर इस्तेमाल किया जा रहा है? नियम साफ हैं, लेकिन पालन धुंधला क्यों है?
सबसे बड़ा भ्रम “सीबीएसई पैटर्न” को लेकर है। स्कूल में पढ़ाई उसी पैटर्न से कराई जा रही है, लेकिन पूरी सीबीएसई संबद्धता का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं आता। यानी छात्र पढ़ तो रहे हैं CBSE स्टाइल में, लेकिन क्या उन्हें वही वैधता मिलेगी? यह सवाल सीधे छात्रों के भविष्य से जुड़ा है—और यहीं मामला सबसे संवेदनशील हो जाता है।
इस पूरे ढांचे के पीछे एक कारोबारी पृष्ठभूमि भी सामने आती है। प्रबंधन एक कोयला कारोबारी परिवार से जुड़ा बताया जाता है। कॉर्पोरेट सेटअप, मल्टी-लोकेशन ऑपरेशन और तेज विस्तार—यह एक सामान्य स्कूल की तस्वीर नहीं लगती। आरोप यह भी हैं कि शिक्षा के नाम पर एक बड़ा वित्तीय मॉडल खड़ा किया गया है। हालांकि इसकी पुष्टि जांच के बाद ही होगी, लेकिन संकेत पूरे सिस्टम को लेकर असहज जरूर करते हैं।
और फिर आता है सबसे अहम सवाल—कार्रवाई का। हाल के दिनों में जिला प्रशासन ने निजी स्कूलों पर सख्ती दिखाई। नोटिस जारी हुए, दस्तावेज मांगे गए, कुछ संस्थानों पर कार्रवाई भी हुई। लेकिन उसी दायरे में आने वाले इस स्कूल पर अब तक ठोस कदम क्यों नहीं? क्या यह महज देरी है या प्रभाव का असर? यह सवाल अब खुले तौर पर उठने लगा है।
व्यापार विहार—जहां से संचालन जुड़ा बताया जा रहा है—वहीं शिक्षा विभाग के संयुक्त संचालक का दायरा भी है। इसके बावजूद इतनी बड़ी गतिविधियां लंबे समय तक बिना हस्तक्षेप कैसे चलती रहीं? “जानकारी नहीं” अब एक कमजोर तर्क लगता है, क्योंकि जमीन पर जो दिख रहा है, वह किसी से छिपा नहीं।
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा दांव पर हैं—छात्र और अभिभावक। फीस पूरी, पढ़ाई पूरी, लेकिन वैधता अधूरी। अगर 10वीं-12वीं स्तर की मान्यता स्पष्ट नहीं, तो परीक्षा, प्रमाणपत्र और आगे की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ेगा। यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि भरोसे का संकट है।
जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे ने माना है कि शिकायतें सामने आई हैं और जांच की तैयारी चल रही है। टीम बनेगी, जांच होगी, और निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएंगे। लेकिन सवाल यही है—क्या यह सिर्फ औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगी या वास्तव में जवाबदेही तय होगी?
बिरला ओपन इंटरनेशनल स्कूल का मामला अब एक संस्थान से आगे बढ़ चुका है। यह उस सिस्टम की कहानी है, जहां नियम किताबों में सख्त हैं, लेकिन जमीन पर लचीले। जहां अनुमति सीमित है, लेकिन संचालन असीमित। और जहां कार्रवाई का पैमाना सबके लिए बराबर नहीं दिखता।
अब नजर जांच पर है। क्योंकि यह सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं—यह बिलासपुर की शिक्षा व्यवस्था की साख का सवाल है।


