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छात्रों की गूंज या सत्ता के खिलाफ हुंकार? पेपर लीक, बेरोजगारी और टूटी उम्मीदों के बीच कांग्रेस ने छेड़ी नई लड़ाई…पूर्व मंत्री जयवर्धन ने भाजपा पर साधा निशाना…

बिलासपुर।

देश की राजनीति में छात्र और युवा हमेशा बदलाव की सबसे बड़ी ताकत रहे हैं। जब युवाओं के सपनों पर संकट आता है, तब उसकी गूंज केवल विश्वविद्यालयों और कोचिंग संस्थानों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सत्ता के गलियारों तक सुनाई देती है। ऐसे ही माहौल में कांग्रेस ने 25 जून से राष्ट्रव्यापी “छात्रों की गूंज” अभियान शुरू किया है, जो सीधे तौर पर पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, परिणामों में देरी और बढ़ती बेरोजगारी जैसे मुद्दों को केंद्र में रखता है।

कांग्रेस इसे छात्रों की आवाज बता रही है, जबकि भाजपा इसे राजनीतिक अवसरवाद कह सकती है। लेकिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग हटकर देखा जाए तो एक सवाल ऐसा है जिसे न सरकार नजरअंदाज कर सकती है और न विपक्ष—क्या देश की परीक्षा और भर्ती व्यवस्था वास्तव में भरोसे के संकट से गुजर रही है?

पिछले कुछ वर्षों में देश ने एक के बाद एक कई ऐसे मामले देखे हैं, जिन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए। लाखों छात्र वर्षों तक कठिन तैयारी करते हैं, परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करते हैं, युवा अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण साल प्रतियोगी परीक्षाओं को समर्पित कर देते हैं। लेकिन जब परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है, परीक्षा रद्द हो जाती है या भर्ती प्रक्रिया वर्षों तक लटक जाती है, तब केवल एक परीक्षा नहीं टूटती—टूटता है एक युवा का विश्वास, एक परिवार का सपना और व्यवस्था पर जनता का भरोसा।

इसी असंतोष को राजनीतिक स्वर देने की कोशिश कांग्रेस ने “छात्रों की गूंज” अभियान के माध्यम से की है। पार्टी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, कथित पेपर लीक नेटवर्क की निष्पक्ष जांच और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की मांग उठाई है। कांग्रेस का आरोप है कि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के संचालन में जवाबदेही और पारदर्शिता का अभाव है, जिसके कारण बार-बार गड़बड़ियां सामने आ रही हैं।

 

मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह ने भी इसी मुद्दे को उठाते हुए कहा कि परीक्षा प्रणाली में लगातार सामने आ रही खामियां सरकार की नीतिगत विफलता को दर्शाती हैं। हालांकि पत्रकारों के सवालों के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि पूरे मामले की जिम्मेदारी शिक्षा मंत्रालय पर बनती है और इसलिए जवाबदेही भी वहीं तय होनी चाहिए।

लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू राजनीति नहीं, बल्कि वह युवा है जो हर परीक्षा के बाद नए सिरे से उम्मीद और निराशा के बीच झूलता रहता है। देश में बेरोजगारी पहले से ही बड़ा मुद्दा है। सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है और प्रतियोगिता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यदि भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी न हो, परीक्षाएं समय पर न हों और परिणाम वर्षों तक लंबित रहें, तो युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक है।

कांग्रेस ने अभियान के तहत तीन प्रमुख मांगें रखी हैं—शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और निष्पक्ष जांच, परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार तथा वार्षिक परीक्षा और भर्ती कैलेंडर लागू कर समयबद्ध नियुक्तियां सुनिश्चित करना। ये मांगें राजनीतिक भले हों, लेकिन इनमें शामिल कई मुद्दे लंबे समय से छात्रों और अभ्यर्थियों द्वारा भी उठाए जाते रहे हैं।

अगले 40 दिनों तक देश के 28 शहरों में चलने वाला यह अभियान छात्र संवाद, कैंपस संपर्क, जनजागरण कार्यक्रम और युवा बैठकों के जरिए युवाओं तक पहुंचने का प्रयास करेगा। कांग्रेस को उम्मीद है कि इससे छात्रों के बीच उसकी राजनीतिक पकड़ मजबूत होगी। वहीं सरकार के लिए यह चुनौती होगी कि वह केवल राजनीतिक जवाब न दे, बल्कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे सवालों का ठोस समाधान भी प्रस्तुत करे।

असल सवाल यही है कि क्या “छात्रों की गूंज” केवल एक राजनीतिक अभियान बनकर रह जाएगी, या फिर यह देश में परीक्षा सुधार, भर्ती पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर राष्ट्रीय बहस का आधार बनेगी?

क्योंकि पेपर लीक सिर्फ एक खबर नहीं है। यह उस छात्र के टूटे हुए विश्वास की कहानी है जिसने रातों की नींद और वर्षों की मेहनत एक परीक्षा पर दांव पर लगाई थी। और जब युवाओं का भरोसा डगमगाता है, तब उसकी गूंज सिर्फ सड़कों पर नहीं, लोकतंत्र की बुनियाद तक सुनाई देती है।

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