बिलासपुरक्राइम

फर्जी मुख्तियारनामा दिखाकर मृत आदिवासी महिला की जमीन का सौदा करने का आरोप, प्रफुल्ल झा फिर पुलिस के शिकंजे में…

बिलासपुर। जमीन की खरीद-बिक्री में मोटा मुनाफा कमाने का सपना देखने वाले लोगों को जालसाज किस तरह निशाना बना सकते हैं, इसका एक गंभीर मामला शहर में सामने आया है। जमीन के नाम पर कथित फर्जीवाड़े के मामले में प्रफुल्ल झा एक बार फिर पुलिस की कार्रवाई के दायरे में है। आरोप है कि उसने जमीन के मालिकाना हक और कानूनी दस्तावेजों को लेकर भ्रामक जानकारी देकर एक व्यक्ति से 10 लाख रुपये हासिल कर लिए। जिस जमीन का सौदा किया गया, उसके राजस्व रिकॉर्ड में एक मृत आदिवासी महिला का नाम दर्ज होने की बात सामने आई है। वहीं, जमीन मालिकों की ओर से सौदा करने के अधिकार के लिए पेश किए गए मुख्तियारनामा की प्रामाणिकता पर भी गंभीर सवाल उठे हैं।

मामले की शुरुआत दयालबंद निवासी विशालचंद्र केसरी की शिकायत से हुई। शिकायत के अनुसार, आरोपी प्रफुल्ल झा ने 10 दिसंबर 2025 को मौजा अमेरी, तहसील सकरी क्षेत्र के विभिन्न खसरों की जमीन का सौदा किया था। जमीन को सामान्य वर्ग की भूमि बताते हुए इसकी कीमत 70 लाख रुपये प्रति एकड़ तय की गई थी।

जमीन खरीदने के इच्छुक विशालचंद्र केसरी ने आरोपी पर भरोसा करते हुए बैंक चेक और आरटीजीएस के माध्यम से 10 लाख रुपये अग्रिम राशि के रूप में दे दिए। पीड़ित को उम्मीद थी कि तय शर्तों के मुताबिक जमीन की रजिस्ट्री हो जाएगी और सौदा कानूनी रूप से पूरा हो जाएगा। लेकिन आगे चलकर जमीन के दस्तावेजों और मालिकाना हक को लेकर ऐसी जानकारी सामने आई, जिसने पूरे लेनदेन को संदेह के घेरे में ला दिया।

शिकायत में सबसे गंभीर सवाल उस जमीन को लेकर उठाया गया है, जिसका सौदा प्रफुल्ल झा द्वारा किए जाने का आरोप है। पड़ताल के दौरान संबंधित भूमि राजस्व रिकॉर्ड में चंद्रकली बाई के नाम दर्ज मिली, जिन्हें शिकायत में गोंड़ आदिवासी समुदाय की महिला बताया गया है। उनकी मृत्यु हो चुकी है।

ऐसे में जमीन के वास्तविक स्वामित्व, उत्तराधिकारियों के अधिकार और विक्रय के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया की जांच महत्वपूर्ण हो गई है। आदिवासी भूमि के हस्तांतरण पर लागू कानूनी प्रतिबंधों और आवश्यक अनुमतियों की अनदेखी हुई या नहीं, यह भी जांच का विषय है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जमीन के स्वामित्व और उसके हस्तांतरण की कानूनी स्थिति स्पष्ट होना जरूरी था, तो खरीदार से 10 लाख रुपये एडवांस किस आधार पर लिए गए? क्या जमीन के सभी वास्तविक अधिकारधारकों की सहमति थी? क्या विक्रेता के पास सौदा करने का वैध अधिकार था? इन सवालों के जवाब पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।

मामले में मसानगंज और तोरवा के कीमती भूखंडों से संबंधित अनुबंध के लिए इस्तेमाल किए गए एक कथित आम मुख्तियारनामा का भी उल्लेख है। शिकायत के अनुसार, आरोपी ने नागपुर में 29 जनवरी 2021 को पंजीकृत दस्तावेज के आधार पर खुद को जमीन मालिकों की ओर से सौदा करने का अधिकृत व्यक्ति बताया था।

पुलिस की जांच में इस दस्तावेज को कथित तौर पर कूटरचित और फर्जी पाया गया है। यदि जांच में यह आरोप प्रमाणित होता है, तो मामला केवल जमीन के सौदे में विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दस्तावेजों की कथित जालसाजी और उनके इस्तेमाल जैसे गंभीर पहलुओं पर भी कार्रवाई का आधार बनेगा।

जमीन के कारोबार में मुख्तियारनामा महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है, क्योंकि इसी के आधार पर कोई व्यक्ति दूसरे की ओर से कानूनी कार्यवाही या संपत्ति के लेनदेन का अधिकार जताता है। ऐसे दस्तावेज की वैधता संदिग्ध होने पर पूरे सौदे की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, रकम देने के बाद जब जमीन की रजिस्ट्री कराने की बारी आई तो आरोपी लगातार प्रक्रिया टालने लगा। आरोप है कि वह रजिस्ट्री को लेकर स्पष्ट जवाब नहीं देता था और कई बार उसका मोबाइल फोन बंद मिलता था। इससे खरीदार का संदेह गहराता गया।

जब विशालचंद्र केसरी ने मामले की पड़ताल की और कथित पुराने फर्जीवाड़े की जानकारी सामने आई, तब उन्हें अपने साथ धोखाधड़ी होने की आशंका हुई। इसके बाद उन्होंने पुलिस अधीक्षक को आवेदन देकर कार्रवाई की मांग की। वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर सिविल लाइन पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए अपराध दर्ज किया।

प्रफुल्ल झा के खिलाफ इससे पहले भी सिविल लाइन थाने में धोखाधड़ी का मामला दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 10 मई 2026 को उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत मामला दर्ज किया गया था। वर्तमान शिकायत में इस पुराने प्रकरण का उल्लेख भी किया गया है।

हालांकि, किसी पुराने मामले में अपराध दर्ज होना अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। लेकिन जमीन के लेनदेन से जुड़े नए आरोपों के बीच पुराने प्रकरण का सामने आना पुलिस जांच को और महत्वपूर्ण बनाता है। अब जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि मामला केवल एक सौदे तक सीमित है या इसके पीछे अन्य संपत्तियों और लोगों से जुड़े लेनदेन की भी कड़ियां हैं।

वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर सिविल लाइन पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), 336, 338 और 340 के तहत अपराध दर्ज किया है। आरोपी प्रफुल्ल झा, उम्र 48 वर्ष, निवासी भारतीय नगर, बिलासपुर के विरुद्ध दर्ज मामले में धोखाधड़ी और कथित जाली दस्तावेजों से जुड़े पहलुओं की जांच की जा रही है।

पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि संबंधित जमीन के दस्तावेज किसने तैयार किए, मुख्तियारनामा की वास्तविक स्थिति क्या है, रकम किन माध्यमों से प्राप्त की गई और क्या इसी तरह के अन्य सौदे भी किए गए थे। आरोपी की अन्य संपत्तियों और कथित गतिविधियों की पड़ताल भी मामले के व्यापक पहलुओं को स्पष्ट कर सकती है।

बिलासपुर में जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े ऐसे आरोप आम खरीदारों के लिए गंभीर चेतावनी हैं। लाखों रुपये की रकम देने से पहले जमीन का खसरा, बी-1, स्वामित्व, उत्तराधिकार की स्थिति, मुख्तियारनामा और लागू कानूनी अनुमतियों की स्वतंत्र जांच बेहद जरूरी है। केवल किसी व्यक्ति के आश्वासन या दस्तावेजों की प्रतियां देखकर बड़ा सौदा करना खरीदार को आर्थिक और कानूनी जोखिम में डाल सकता है।

इस मामले में अब सबसे अहम सवाल यह है कि विशालचंद्र केसरी के 10 लाख रुपये का क्या होगा, जमीन के सौदे के पीछे की वास्तविक स्थिति क्या है और कथित फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किस स्तर पर हुआ। पुलिस जांच से इन सवालों का जवाब मिलने की उम्मीद है।

फिलहाल, प्रफुल्ल झा के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच जारी है। अदालत में दोष सिद्ध होने तक आरोपी को निर्दोष माना जाना कानूनी सिद्धांत है। हालांकि, कथित फर्जी मुख्तियारनामा, मृत आदिवासी महिला के नाम दर्ज जमीन और 10 लाख रुपये के लेनदेन ने बिलासपुर के जमीन कारोबार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि पुलिस जांच में इस कथित फर्जीवाड़े की कितनी परतें खुलती हैं और पीड़ित को उसकी रकम वापस दिलाने की दिशा में क्या कार्रवाई होती है।

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