
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की जेलों में कैदियों की बढ़ती तादाद ने जेल व्यवस्था की क्षमता, सुरक्षा और सुधारात्मक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश की 33 जेलों में जितने कैदियों को रखने की व्यवस्था है, उससे कहीं अधिक बंदियों को रखा जा रहा है। हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से पेश शपथपत्र के मुताबिक, 30 सितंबर 2026 तक प्रदेश की केंद्रीय, जिला और उपजेलों की कुल क्षमता 15,025 कैदियों की है, जबकि वास्तविक संख्या बढ़कर 22,980 पहुंच गई है। यानी जेलों में निर्धारित क्षमता से 7,955 अधिक कैदी बंद हैं। यह आंकड़ा केवल जेलों में भीड़ का नहीं, बल्कि जेल प्रबंधन, सुरक्षा और कैदियों के पुनर्वास के सामने खड़ी बड़ी चुनौती का संकेत भी है।
प्रदेश की जेलों में निर्धारित क्षमता के मुकाबले कैदियों की संख्या लगभग 53 प्रतिशत अधिक है। ऐसी स्थिति में जेलों के भीतर उपलब्ध स्थान, कर्मचारियों पर काम का दबाव, सुरक्षा व्यवस्था और बंदियों को जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की चुनौती बढ़ना स्वाभाविक है। सवाल यह भी है कि जब जेलों की मौजूदा क्षमता से हजारों अधिक कैदी बंद हैं, तो इस दबाव को कम करने के लिए दीर्घकालिक योजना कितनी प्रभावी साबित हो रही है?
जेलों का उद्देश्य केवल अपराध के आरोपियों या दोषियों को बंद रखना नहीं, बल्कि कानून के अनुरूप उनकी निगरानी, सुधार और पुनर्वास सुनिश्चित करना भी है। लेकिन जब क्षमता से कहीं अधिक कैदी एक साथ रखे जाते हैं, तो सुधारात्मक गतिविधियों को प्रभावी ढंग से संचालित करना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
जेलों में बढ़ते दबाव के बीच राज्य सरकार ने बेमेतरा जिले के पथर्रा गांव में 200 कैदियों की क्षमता वाली खुली जेल यानी ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशन स्थापित करने के लिए अधिसूचना जारी की है। इसके संचालन के लिए 48 पदों के सृजन पर विचार किया जा रहा है। सरकार ने 21 सितंबर 2026 के आदेश से यहां 15 कर्मचारियों की तैनाती को मंजूरी भी दी है।
इसके बावजूद सुरक्षा संबंधी कुछ मुद्दों के कारण खुली जेल अब तक शुरू नहीं हो सकी है। जेल अधीक्षक की नियुक्ति और सीधी भर्ती की अनुमति पर भी विचार किया जा रहा है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्रदेश की जेलों में क्षमता से लगभग आठ हजार अधिक कैदी बंद हैं, तब 200 कैदियों की क्षमता वाली खुली जेल को शुरू करने में हो रही देरी कब खत्म होगी? हालांकि, इसके शुरू होने से प्रदेश की जेलों में मौजूद अतिरिक्त कैदियों की समस्या का केवल सीमित समाधान ही हो सकेगा। इसके लिए व्यापक स्तर पर क्षमता विस्तार और वैकल्पिक सुधारात्मक व्यवस्थाओं की जरूरत बनी रहेगी।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में पेश शपथपत्र में कैदियों के पुनर्वास और उन्हें रोजगार के योग्य बनाने के लिए उठाए जा रहे कदमों का भी उल्लेख किया है। इसके तहत 17 अगस्त 2026 को जन शिक्षण संस्थान, रायपुर के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
इस पहल का उद्देश्य कैदियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र उपलब्ध कराना तथा उन्हें औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों, आजीविका कॉलेजों और अन्य कौशल विकास केंद्रों से जोड़ना है। इसका मकसद यह है कि जेल से रिहा होने के बाद कैदी रोजगार हासिल कर सकें या स्वरोजगार शुरू करके सम्मानजनक जीवन की ओर लौट सकें।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि जेल से रिहाई के बाद रोजगार का अभाव और सामाजिक स्वीकार्यता की कमी कई लोगों के पुनर्वास में बाधा बन सकती है। लेकिन इन योजनाओं की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि कितने कैदियों को प्रशिक्षण मिलता है, कितनों को प्रमाणपत्र दिए जाते हैं और कितने लोग रिहाई के बाद वास्तव में रोजगार या स्वरोजगार से जुड़ पाते हैं।
सरकार कैदियों के आर्थिक पुनर्वास के लिए जेलों में काम करने वाले बंदियों के पारिश्रमिक की दरों में संशोधन और वृद्धि पर भी विचार कर रही है। यदि इस दिशा में प्रभावी निर्णय लिया जाता है, तो कैदियों को उनके श्रम का बेहतर पारिश्रमिक मिलने के साथ रिहाई के बाद आर्थिक रूप से दोबारा खड़े होने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा, 12 फरवरी 2026 को इंडियन ओवरसीज बैंक के साथ समझौता ज्ञापन किया गया है। इसके माध्यम से पात्र कैदियों को रिहाई के बाद बैंकिंग और ऋण सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है, ताकि वे स्वरोजगार शुरू कर सकें और आजीविका के स्थायी साधन विकसित कर सकें।
हालांकि, इन योजनाओं का लाभ कितने पात्र कैदियों तक पहुंचेगा, ऋण प्राप्त करने की प्रक्रिया कितनी आसान होगी और प्रशिक्षण के बाद रोजगार के अवसर किस तरह उपलब्ध कराए जाएंगे, इन सवालों के जवाब भी महत्वपूर्ण होंगे।
मुख्य न्यायाधीश कृष्ण राम महापात्र और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से पेश शपथपत्र को रिकॉर्ड पर लिया है। मामले को आगे की निगरानी और विचार के लिए 2 दिसंबर 2026 को सुनवाई के लिए निर्धारित किया गया है।
अब अगली सुनवाई में जेलों की क्षमता से अधिक कैदियों की मौजूदगी, खुली जेल के संचालन और पुनर्वास से जुड़ी योजनाओं पर आगे क्या स्थिति सामने आती है, इस पर नजर रहेगी।
छत्तीसगढ़ की जेलों में 15,025 की क्षमता के मुकाबले 22,980 कैदियों का बंद होना अपने आप में गंभीर स्थिति को दर्शाता है। सरकार ने खुली जेल, कौशल विकास, पारिश्रमिक में वृद्धि और बैंकिंग सुविधाओं जैसी पहलों का उल्लेख किया है, लेकिन इनका असर तभी दिखाई देगा जब योजनाएं समयबद्ध तरीके से लागू हों और उनके परिणामों का नियमित आकलन किया जाए।
जेलों में अतिरिक्त भीड़ कम करने के लिए केवल नई सुविधाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। जेलों की क्षमता, कर्मचारियों की उपलब्धता, सुरक्षा, कैदियों के अधिकार और पुनर्वास की व्यवस्था पर एक साथ ध्यान देना होगा। अब निगाहें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई और सरकार की ओर से उठाए जाने वाले ठोस कदमों पर टिकी हैं।

