बिलासपुर। शिक्षा को समाज की सबसे संवेदनशील व्यवस्था माना जाता है, जहां पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमों का पालन केवल औपचारिकता नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी होती है। लेकिन तिफरा-परसदा स्थित मॉडर्न एंड मॉरल पब्लिक स्कूल को लेकर सामने आ रहे आरोप इस पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। मामला अब केवल फीस वसूली तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह बहस का विषय बन चुका है कि क्या रसूख और प्रभाव के सामने शिक्षा संबंधी नियम बौने पड़ते जा रहे हैं?
अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल में फीस निर्धारण और वसूली की प्रक्रिया पूरी तरह अपारदर्शी है। सबसे बड़ा सवाल उस “स्कूल लेवल फीस कमेटी” को लेकर उठ रहा है, जिसका गठन निजी स्कूलों में फीस तय करने के लिए अनिवार्य माना जाता है। आरोप है कि ऐसी कोई सक्रिय समिति अभिभावकों को दिखाई ही नहीं देती, फिर आखिर फीस तय कौन कर रहा है और किस आधार पर कर रहा है? यदि फीस निर्धारण की प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में हो, तो पूरी व्यवस्था की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अभिभावकों की शिकायत है कि फीस को अलग-अलग मदों में स्पष्ट करने के बजाय एकमुश्त राशि के रूप में किश्तों में वसूला जा रहा है। इससे यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि ट्यूशन फीस कितनी है, डेवलपमेंट फीस कितनी और अन्य मदों में क्या-क्या जोड़ा गया है। कई अभिभावकों का दावा है कि नर्सरी और छोटे बच्चों से भी लैब तथा लाइब्रेरी शुल्क लिया जा रहा है, जबकि व्यवहारिक रूप से इन सुविधाओं का उपयोग ही नहीं होता। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या छोटे बच्चों पर भी वही शुल्क संरचना थोप दी गई है जो उच्च कक्षाओं पर लागू होती है?
स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। कुछ अभिभावकों ने यह आरोप भी लगाए हैं कि फीस जमा करने के बाद विधिवत और विस्तृत रसीद तक नहीं दी जाती। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न है। आखिर शिक्षा संस्थानों में शुल्क वसूली का रिकॉर्ड भी स्पष्ट नहीं रहेगा तो जवाबदेही तय कैसे होगी?
स्पोर्ट्स फीस को लेकर भी नाराजगी बढ़ रही है। जिन विद्यार्थियों की खेल गतिविधियों में कोई भागीदारी नहीं है, उनसे भी शुल्क वसूले जाने की शिकायतें सामने आई हैं। परिवहन सुविधा लेने वाले विद्यार्थियों से अलग से अधिक राशि लिए जाने के आरोपों ने भी अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। कुल मिलाकर अभिभावकों का कहना है कि फीस वसूली की पूरी प्रक्रिया “जानकारी कम, भुगतान ज्यादा” वाली व्यवस्था बन चुकी है।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिला मुख्यालय के आसपास संचालित कई निजी स्कूलों में कथित अनियमितताओं की बातें लगातार सामने आने के बावजूद शिक्षा विभाग की चुप्पी सवालों के घेरे में है। क्या विभाग को इन व्यवस्थाओं की जानकारी नहीं है, या फिर सब कुछ देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है? यह सवाल अब आम अभिभावकों की जुबान पर है।
नियम कहते हैं कि फीस संरचना और उससे जुड़ी जानकारी सार्वजनिक सूचना पटल पर प्रदर्शित की जानी चाहिए, ताकि अभिभावकों को स्पष्ट जानकारी मिल सके। लेकिन यदि यही जानकारी अस्पष्ट रहे, तो पारदर्शिता का दावा केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि विद्यालय प्रबंधन समिति की जिम्मेदारी केवल स्कूल चलाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी होता है कि हर प्रक्रिया कानून और नियमों के अनुरूप हो। यदि फीस निर्धारण और वसूली में अनियमितता सिद्ध होती है, तो संबंधित जिम्मेदारों पर कार्रवाई का प्रावधान भी मौजूद है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या कार्रवाई वास्तव में होगी?
यह पूरा मामला अब केवल एक स्कूल का विवाद नहीं रहा। यह उस शिक्षा व्यवस्था का आईना बन गया है, जहां अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य के नाम पर हर मांग मानने को मजबूर दिखाई देते हैं, और संस्थान जवाबदेही से दूर होते जा रहे हैं।
अब निगाहें जिला शिक्षा विभाग और प्रशासन पर टिकी हैं। क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी? क्या फीस वसूली की वास्तविक स्थिति सामने आएगी? या फिर यह मामला भी रसूख और प्रभाव की दीवारों के पीछे दब जाएगा?
क्योंकि सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं है—सवाल यह है कि क्या कानून वास्तव में सबके लिए बराबर है, या कुछ संस्थानों के सामने उसकी धार कुंद पड़ जाती है।


