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सुस्त ठेकेदारों पर चला बुलडोजर, दो ब्लैकलिस्ट… आठ को नोटिस, अब सड़क-पुल परियोजनाओं में नहीं चलेगी लेट-लतीफी…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में सड़क और पुल निर्माण की सुस्त रफ्तार पर आखिरकार सरकार का डंडा चलना शुरू हो गया है। वर्षों से अधूरे पड़े निर्माण कार्यों, बढ़ती लागत और जनता की परेशानियों के बीच उप मुख्यमंत्री एवं लोक निर्माण मंत्री अरुण साव की नाराजगी अब कार्रवाई में बदलती दिखाई दे रही है। दो ठेकेदारों का पंजीयन निरस्त कर दिया गया है, जबकि आठ अन्य ठेकेदारों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। यह कदम केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को संदेश है जहां लंबे समय से निर्माण कार्यों में देरी को सामान्य मान लिया गया था।

बस्तर संभाग में सड़क और पुल केवल विकास परियोजनाएं नहीं हैं, बल्कि हजारों ग्रामीणों के जीवन, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की जीवनरेखा हैं। ऐसे में किसी सड़क का वर्षों तक अधूरा रहना या पुल निर्माण में लगातार देरी होना सीधे तौर पर जनता के अधिकारों पर असर डालता है। यही वजह है कि अरुण साव ने अपने हालिया बस्तर दौरे के दौरान निर्माण कार्यों की धीमी गति पर खुलकर नाराजगी जताई और अधिकारियों के साथ-साथ ठेकेदारों को भी स्पष्ट संदेश दिया कि अब लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ेगी।

लोक निर्माण विभाग द्वारा गुप्ता कंस्ट्रक्शन कंपनी का दो वर्षों के लिए पंजीयन निरस्त किया जाना इस कार्रवाई का सबसे बड़ा उदाहरण है। कंपनी कोंडागांव और कबीरधाम जिले में चार महत्वपूर्ण पुल परियोजनाओं पर काम कर रही थी, लेकिन निर्माण की गति लगातार लक्ष्य से पीछे रही। इसी तरह कांकेर जिले में दो पुल निर्माण कार्यों में देरी के कारण ठेकेदार निर्भय राम साहू के खिलाफ भी दो वर्षों के लिए पंजीयन निरस्तीकरण की कार्रवाई की गई है।

हालांकि यह कार्रवाई कई सवाल भी खड़े करती है। यदि विभाग लगातार समीक्षा कर रहा था और ठेकेदारों को बार-बार निर्देश दिए जा रहे थे, तो फिर परियोजनाएं इतनी पीछे कैसे चली गईं? क्या निगरानी व्यवस्था कमजोर थी? क्या अधिकारियों ने समय रहते सख्ती नहीं दिखाई? या फिर कुछ ठेकेदारों को लंबे समय तक छूट मिलती रही? जनता के बीच यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहे हैं।

दरअसल, प्रदेश में सड़क और पुल निर्माण की सबसे बड़ी समस्या केवल तकनीकी या वित्तीय नहीं, बल्कि जवाबदेही की भी रही है। अक्सर परियोजनाएं समय सीमा पार कर जाती हैं, लागत बढ़ जाती है और आम लोगों को धूल, कीचड़, जाम और खराब संपर्क व्यवस्था का सामना करना पड़ता है। बाद में जिम्मेदारियों का निर्धारण करने के बजाय नई समय-सीमा घोषित कर दी जाती है। ऐसे में मौजूदा कार्रवाई को उसी स्थिति को बदलने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

विभाग द्वारा कांकेर, कोंडागांव, जगदलपुर और सुकमा जिले की कई सड़क परियोजनाओं में देरी पर ठेकेदारों को नोटिस जारी करना भी इसी अभियान का हिस्सा है। निर्माण कार्यक्रम और तय माइलस्टोन्स से पीछे चल रहे कार्यों पर विभाग अब सीधे जवाब मांग रहा है। लेकिन जनता के लिए यह जानना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि जिन परियोजनाओं पर कार्रवाई हुई है, वे कब तक पूरी होंगी और जिन लोगों को वर्षों से बेहतर सड़क का इंतजार है, उन्हें राहत कब मिलेगी।

अरुण साव ने साफ कहा है कि गुणवत्ता और समय-सीमा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है तथा किसी भी प्रकार की लेट-लतीफी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह बयान राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बस्तर क्षेत्र में सड़क और कनेक्टिविटी विकास का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है। सरकार यदि इन परियोजनाओं को समय पर पूरा कराने में सफल होती है तो इसका सीधा असर क्षेत्र के विकास और जनविश्वास पर पड़ेगा।

फिलहाल यह कार्रवाई एक मजबूत शुरुआत जरूर मानी जा सकती है। लेकिन असली परीक्षा अब होगी। जनता नोटिसों और पंजीयन निरस्तीकरण की खबरों से ज्यादा उन सड़कों और पुलों को देखना चाहती है जो वर्षों से अधूरे पड़े हैं। यदि आने वाले महीनों में निर्माण कार्यों की रफ्तार बढ़ती है और परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं, तब यह कहा जा सकेगा कि सरकार की सख्ती केवल दिखावा नहीं, बल्कि व्यवस्था में बदलाव की वास्तविक कोशिश है।

बस्तर की जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—क्या इस बार कार्रवाई फाइलों तक सीमित रहेगी, या फिर अधूरी सड़कों पर विकास की गाड़ी सचमुच दौड़ती नजर आएगी? यही सवाल इस पूरे अभियान की सफलता या विफलता तय करेगा।

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