बिलासपुर। शिक्षा को किसी भी समाज की सबसे मजबूत नींव माना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बावजूद हजारों छात्र अब तक अपनी पाठ्यपुस्तकों के इंतजार में हैं। सवाल यह है कि जब सरकार हर साल शिक्षा सत्र की तिथियां पहले से तय करती है, बजट पहले से स्वीकृत होता है और पाठ्यपुस्तकों की जरूरत भी पहले से ज्ञात होती है, तब आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि बच्चे स्कूल पहुंच गए, कक्षाएं शुरू हो गईं, लेकिन किताबें नहीं पहुंचीं?
इस मुद्दे को लेकर बिलासपुर निजी विद्यालय संचालक संघ ने जो आरोप लगाए हैं, वे केवल प्रशासनिक अव्यवस्था का मामला नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलता की ओर इशारा करते हैं। संघ का कहना है कि पाठ्यपुस्तक निगम की लापरवाही के कारण लाखों विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर लग गया है। यदि यह आरोप सही हैं तो यह केवल एक विभागीय चूक नहीं बल्कि बच्चों के मौलिक शैक्षणिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी स्कूलों में 15 जून तक किताबें पहुंच सकती हैं तो निजी स्कूलों के विद्यार्थियों को 21 जुलाई तक इंतजार क्यों कराया जा रहा है? क्या शिक्षा का अधिकार स्कूल के प्रकार देखकर तय होगा? क्या सरकारी और निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों के बीच इस तरह का भेदभाव उचित माना जा सकता है?
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई स्कूलों में पढ़ाई बिना पुस्तकों के शुरू करनी पड़ी है। शिक्षक नोट्स के सहारे पढ़ाने को मजबूर हैं, जबकि छात्र और अभिभावक असमंजस में हैं। एक ओर सरकार गुणवत्ता युक्त शिक्षा, बेहतर परीक्षा परिणाम और राष्ट्रीय शिक्षा नीति की बात करती है, दूसरी ओर बच्चों के हाथों में समय पर किताबें तक नहीं पहुंच पा रही हैं।
निजी विद्यालय संचालक संघ का आरोप है कि यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। पिछले वर्ष भी कई स्कूलों को सितंबर तक किताबें नहीं मिली थीं। यदि एक साल पहले भी यही समस्या थी और उस दौरान अधिकारियों ने सुधार का आश्वासन दिया था, तो फिर इस वर्ष हालात और खराब कैसे हो गए? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई? क्या किसी के खिलाफ कार्रवाई हुई? यदि नहीं, तो इसका अर्थ यही है कि व्यवस्था में जवाबदेही नाम की कोई चीज बची ही नहीं है।
दरअसल यह मामला केवल किताबों की आपूर्ति का नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता का भी है। फरवरी में बोर्ड परीक्षाएं प्रस्तावित हैं। पाठ्यक्रम पहले से निर्धारित है। ऐसे में एक महीने से अधिक समय तक किताबें नहीं मिलने का सीधा असर विद्यार्थियों की तैयारी पर पड़ेगा। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए यह समस्या और भी गंभीर है, क्योंकि उनके पास वैकल्पिक अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं होती।
अब निजी विद्यालय संचालक संघ ने आंदोलन की चेतावनी दी है। यदि 25 जून को स्कूल बंद कर प्रदर्शन की नौबत आती है और फिर 5 जुलाई के बाद प्रदेशव्यापी आंदोलन होता है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या सरकार समय रहते इस संकट का समाधान करेगी या फिर बच्चों की पढ़ाई एक बार फिर प्रशासनिक खींचतान की भेंट चढ़ जाएगी?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पाठ्यपुस्तक निगम की प्राथमिकता क्या है? यदि बच्चों तक समय पर किताबें पहुंचाना भी व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया है, तो फिर शिक्षा सुधार के बड़े-बड़े दावों का क्या अर्थ रह जाता है?
क्योंकि शिक्षा केवल भवनों, घोषणाओं और योजनाओं से नहीं चलती, बल्कि समय पर किताबें, शिक्षक और संसाधन उपलब्ध कराने से चलती है। और जब किताबें ही बच्चों तक नहीं पहुंचें, तो यह केवल वितरण में देरी नहीं, बल्कि उनके भविष्य के साथ किया गया एक ऐसा खिलवाड़ है, जिसकी कीमत आने वाले वर्षों में विद्यार्थी चुकाएंगे।


