बिलासपुर। लगभग 200 करोड़ रुपये की लागत से बना 220 बिस्तरों वाला सुपर स्पेशलिटी अस्पताल आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का प्रतीक माना गया था। उम्मीद थी कि अब बिलासपुर संभाग के मरीजों को हार्ट, किडनी, न्यूरो और अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए रायपुर, नागपुर या दिल्ली जैसे बड़े शहरों का रुख नहीं करना पड़ेगा। लेकिन लोकार्पण के कई महीने बाद भी अस्पताल अपनी पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पाया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या करोड़ों रुपये खर्च कर सिर्फ एक आलीशान भवन खड़ा कर देना ही सरकार की उपलब्धि है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 अक्टूबर 2024 को इस अस्पताल का लोकार्पण किया था। इसके बाद मुख्यमंत्री ने भी अस्पताल का निरीक्षण किया। बावजूद इसके, मरीजों को आज भी वे सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं, जिनके वादे किए गए थे। अस्पताल का विशाल भवन तो तैयार है, लेकिन अगर उसमें डॉक्टर नहीं, अत्याधुनिक मशीनें पूरी तरह चालू नहीं और गंभीर मरीजों का इलाज नहीं हो पा रहा, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष विजय केसरवानी ने अस्पताल की अधूरी व्यवस्थाओं को लेकर सरकार को घेरा है। उनका कहना है कि ऑक्सीजन प्लांट, कैथ लैब, 24 घंटे इमरजेंसी सेवा, विशेषज्ञ डॉक्टर, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, तकनीकी कर्मचारी और आधुनिक एंबुलेंस जैसी कई जरूरी सुविधाएं अब तक पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। उनका आरोप है कि गंभीर मरीजों को आज भी दूसरे अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है, जिससे सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के उद्देश्य पर ही प्रश्नचिह्न लग गया है।
सबसे अहम सवाल जवाबदेही का है। यदि अस्पताल पूरी तरह तैयार नहीं था तो उसका लोकार्पण इतनी जल्दबाजी में क्यों किया गया? और यदि तैयार था, तो फिर आज तक सभी विभाग और सेवाएं शुरू क्यों नहीं हो सकीं? करोड़ों रुपये की सार्वजनिक राशि खर्च होने के बाद भी जनता को अधूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मिलना निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
विजय केसरवानी ने सरकार से मांग की है कि अस्पताल को पूरी क्षमता से शुरू करने की स्पष्ट समय-सीमा घोषित की जाए। विशेषज्ञ डॉक्टरों और तकनीकी स्टाफ की नियमित नियुक्तियां कब होंगी, आवश्यक मशीनें और सेवाएं कब तक शुरू होंगी तथा क्या भविष्य में इस अस्पताल को निजी हाथों में सौंपने की कोई योजना है—इन सभी सवालों पर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
यह केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं, बल्कि लाखों लोगों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा मुद्दा है। बिलासपुर संभाग के लोगों ने इस अस्पताल से बेहतर इलाज की उम्मीदें बांधी थीं। यदि यह अस्पताल पूरी क्षमता से शुरू हो जाता है तो हजारों मरीजों को समय पर बेहतर इलाज मिल सकेगा और आर्थिक बोझ भी कम होगा।
फिलहाल अस्पताल प्रबंधन या राज्य सरकार की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन जनता अब आश्वासन नहीं, बल्कि अस्पताल में पूरी तरह शुरू होती स्वास्थ्य सेवाएं देखना चाहती है। क्योंकि अस्पताल की असली पहचान उसकी भव्य इमारत नहीं, बल्कि वहां मिलने वाला प्रभावी और समय पर उपचार होता है।
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