बिलासपुर। आम आदमी के लिए सरकारी दफ्तरों में अपना वैध काम कराना आज भी कई बार किसी परीक्षा से कम नहीं है। जमीन का नक्शा-बटांकन हो या खेत तक बिजली पहुंचाने की प्रक्रिया, जिन सेवाओं को व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए, वे कई जगहों पर कथित तौर पर रिश्वत के बिना आगे नहीं बढ़तीं। गुरुवार को बिलासपुर में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की दो बड़ी कार्रवाइयों ने इसी कड़वी हकीकत को एक बार फिर उजागर कर दिया।
रतनपुर क्षेत्र के ग्राम लालपुर में पदस्थ पटवारी भानू चंद्राकर और मस्तूरी स्थित बिजली वितरण कंपनी के क्लर्क सहदेव कुमार चंद्रा को ACB ने अलग-अलग ट्रैप कार्रवाई में रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। दोनों मामलों में शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि उनके वैध कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए पैसे की मांग की जा रही थी।
पहले मामले में रतनपुर निवासी अशोक अग्रवाल अपनी जमीन के नक्शा-बटांकन संबंधी कार्य के लिए पटवारी के पास पहुंचे थे। आरोप है कि पटवारी ने शुरुआत में 40 हजार रुपए की मांग की। बाद में मोलभाव के बाद यह रकम 25 हजार रुपए पर तय हुई। शिकायत ACB तक पहुंची, जांच हुई और फिर वही हुआ जिसका इंतजार शिकायतकर्ता कर रहे थे। जैसे ही रिश्वत की रकम पटवारी के हाथ में पहुंची, ACB की टीम ने उसे दबोच लिया।
दूसरी ओर मस्तूरी में शासन की योजना के तहत खेत में बिजली पोल लगाने की प्रक्रिया पूरी कराने के लिए किसान त्रिलोकी साहू से कथित रूप से 10 हजार रुपए मांगे गए। किसान ने भी हिम्मत दिखाई और शिकायत दर्ज कराई। सत्यापन के बाद ACB ने जाल बिछाया और क्लर्क सहदेव कुमार चंद्रा को रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार कर लिया।
यह मामला केवल दो कर्मचारियों की गिरफ्तारी भर नहीं है। यह उस सोच पर सवाल है जिसमें सरकारी सेवा को अधिकार नहीं बल्कि “कमाई का अवसर” समझ लिया जाता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि दोनों मामले सीधे किसानों और आम नागरिकों से जुड़े हैं। एक व्यक्ति अपनी जमीन के दस्तावेजी कार्य के लिए भटक रहा था, तो दूसरा अपने खेत तक बिजली पहुंचाने की उम्मीद लगाए बैठा था। लेकिन कथित तौर पर दोनों के सामने पहले रिश्वत की शर्त रख दी गई।
ACB की कार्रवाई ने यह भी साबित किया है कि यदि पीड़ित सामने आएं और शिकायत करें तो भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई संभव है। अक्सर लोग मजबूरी में रिश्वत देकर चुप हो जाते हैं, जिससे भ्रष्टाचार का यह चक्र और मजबूत होता जाता है। इस बार शिकायतकर्ताओं ने चुप्पी नहीं साधी और नतीजा यह रहा कि दो सरकारी कर्मचारी कानून के शिकंजे में आ गए।
राजस्व और बिजली विभाग में हुई इन गिरफ्तारियों के बाद स्वाभाविक रूप से हड़कंप है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह केवल दो व्यक्तियों का मामला है या फिर व्यवस्था के भीतर कहीं गहरे तक फैली उस बीमारी का हिस्सा है, जिसकी शिकायतें वर्षों से सामने आती रही हैं।
फिलहाल ACB ने दोनों आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज कर लिया है और आगे की जांच जारी है। लेकिन इस कार्रवाई का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सरकारी सेवाओं की कीमत रिश्वत नहीं हो सकती, और जो लोग जनता की मजबूरी को कमाई का जरिया समझते हैं, उनके लिए कानून का जाल कभी भी बिछ सकता है।


