Thursday, March 19, 2026
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नारायणा ई-टेक्नो स्कूल पर गंभीर आरोप: मान्यता, फीस और संचालन में गड़बड़ियों से शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता कटघरे में…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के रायपुर, दुर्ग-भिलाई और बिलासपुर सहित चार जिलों में संचालित नारायणा ई-टेक्नो स्कूलों की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आए दस्तावेज और जमीनी तथ्य शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता, जवाबदेही और नियामकीय नियंत्रण पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। मान्यता, फीस वसूली, शैक्षणिक प्रक्रिया और प्रशासनिक ढांचे में स्पष्ट विसंगतियां सामने आई हैं, जिससे यह मामला अब एक संस्थान से आगे बढ़कर पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ता दिख रहा है।

सूत्रों के अनुसार, स्कूल नेटवर्क का संचालन पूरी तरह बाहरी केंद्रों से नियंत्रित होता है। स्थानीय स्तर पर न तो कोई स्वतंत्र गारंटर मौजूद है और न ही ऐसा जिम्मेदार प्रतिनिधि जो संस्थान की गतिविधियों के लिए जवाबदेह हो। सभी महत्वपूर्ण निर्णय बाहरी कार्यालयों में लिए जाते हैं, जबकि स्थानीय स्तर पर केवल कर्मचारियों के जरिए संचालन होता है। इससे जवाबदेही और नियंत्रण के बीच बड़ा अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

बिलासपुर के नेहरू नगर, अमेरी रोड स्थित स्कूल लीज पर लिए गए भवन में संचालित हो रहा है। संस्थान का अपना स्थायी ढांचा नहीं है, बावजूद इसके यहां नियमित रूप से फीस वसूली और शैक्षणिक गतिविधियां जारी हैं। यह स्थिति संस्थागत स्थायित्व और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े करती है।

दस्तावेजों के अनुसार, विद्यालय को राज्य शासन से मान्यता 31 मार्च 2026 तक प्राप्त थी, लेकिन इसी दौरान अभिभावकों को CBSE संबद्धता का हवाला देकर प्रवेश दिया गया और फीस वसूली गई। जबकि CBSE संबद्धता सत्र 2026-27 से प्रभावी होना दर्शाया गया है। यह तथ्य अभिभावकों को दी गई जानकारी की सत्यता पर गंभीर प्रश्न उठाता है।

शैक्षणिक स्तर पर भी अनियमितताएं सामने आई हैं। पूरे सत्र में न तो राज्य बोर्ड के अनुसार पढ़ाई कराई गई और न ही CBSE पैटर्न के अनुरूप तैयारी सुनिश्चित की गई। कक्षा 5 के छात्रों को परीक्षा से ठीक पहले सीमित प्रैक्टिस पेपर देकर सीधे परीक्षा में शामिल करना शैक्षणिक गुणवत्ता और प्रक्रिया की निरंतरता पर सवाल खड़ा करता है।

फीस निर्धारण प्रक्रिया भी नियमों के विपरीत पाई गई है। न तो किसी वैधानिक समिति का गठन किया गया और न ही जिला शिक्षा अधिकारी या नोडल अधिकारी की स्वीकृति ली गई। इसके बावजूद फीस में करीब 8 प्रतिशत वृद्धि कर दी गई, जिसकी न तो पूर्व सूचना दी गई और न ही कोई आधिकारिक आधार प्रस्तुत किया गया।

विद्यालय प्रबंधन द्वारा पुस्तकों को निशुल्क बताया जाता है, लेकिन शुल्क संरचना से संकेत मिलता है कि उनकी लागत अन्य मदों में जोड़कर वसूली जा रही है। इससे फीस प्रणाली की पारदर्शिता संदिग्ध हो जाती है।

वित्तीय व्यवस्था भी पूरी तरह केंद्रीकृत बताई जा रही है। अभिभावकों से ली गई फीस सीधे मुंबई स्थित खाते में जमा होती है, जबकि कर्मचारियों का PF और ESIC नेल्लोर और मुंबई के कार्यालयों में जमा किया जाता है। इस व्यवस्था से राज्य स्तर पर वित्तीय निगरानी और ऑडिट की प्रक्रिया लगभग समाप्त हो जाती है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं।

प्रशासनिक संरचना में भी स्वतंत्रता का अभाव देखा गया है। राज्य स्तर पर प्रस्तुत कार्यकारिणी में केवल वेतनभोगी कर्मचारी शामिल हैं, जिससे निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह आंतरिक नियंत्रण में रहती है और बाहरी निगरानी का अभाव बना रहता है।

अभिभावकों ने फीस, पढ़ाई और परीक्षा प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां दर्ज करने की कोशिश की, लेकिन उन पर दबाव बनाए जाने की बात भी सामने आई है। कई अभिभावक खुलकर सामने नहीं आ सके, जिससे स्थिति की गंभीरता पूरी तरह उजागर नहीं हो पाई।

सबसे अहम बात यह है कि जिला स्तर के संबंधित अधिकारियों को इन तथ्यों की जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। यह प्रशासनिक निष्क्रियता और नियामकीय तंत्र की भूमिका पर सीधे सवाल खड़ा करता है।

इससे पहले भी राज्य में डॉल्फिन स्कूल प्रकरण में इसी तरह की अनियमितताएं सामने आ चुकी हैं। वर्तमान मामला उसी तरह के पैटर्न को दोहराता नजर आता है, जहां केंद्रीकृत नियंत्रण और स्थानीय जवाबदेही का अभाव स्पष्ट रूप से मौजूद है।

कुल मिलाकर, यह मामला केवल एक स्कूल या संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और नियामकीय सख्ती पर व्यापक असर डालने वाला बन गया है। इसका सीधा प्रभाव छात्रों की पढ़ाई, परीक्षा और भविष्य पर पड़ रहा है, जबकि अभिभावकों की जमा की गई फीस की सुरक्षा और उपयोग भी सवालों के घेरे में है।

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