Thursday, March 12, 2026
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पार्ट 2…रामदयाल उइके के कांग्रेस छोड़ने के सियासी मायने… जोगी के दावे पर सच्चाई कितनी… कांग्रेस ने क्या खोया और भाजपा ने क्या पाया…


पार्ट 1….लगातार…झीरमघाटी में कांग्रेस ने न केवल लोकप्रिय नेता नंदकुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल को खोया था, बल्कि बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा को खोना पार्टी के लिए बस्तर और प्रदेश के सबसे बड़े आदिवासी नेता को खोना साबित हुआ। साथ ही मनकुराम सोढ़ी भी अब नहीं रहे। इस बीच अजीत जोगी कांग्रेस छोड़कर अपनी खुद की पार्टी बना चुके हैं और बसपा के साथ उनका गठबंधन आदिवासी और अनुसूचित जाति दोनों वोटरों को साधने का प्रयास है।

विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष कवासी लखमा कांग्रेस के पास बस्तर में दूसरा आदिवासी नेतृत्व विकल्प हैं, पर जोगी से उनका प्रेम पार्टी और राजनैतिक गलियारे में उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। रामदयाल उइके बस्तर में न सही, पर आदिवासियों में अपना प्रभाव तो रखते हैं। उनके चले जाने के बहुत से मायने हैं, जिसमें सबसे अहम मायने हैं कांग्रेस में बड़े क़द के आदिवासी नेता का न होना।

ऐसे में बस्तर और प्रदेश में पुनः अरविंद नेताम के प्रभाव का लाभ उठाने कांग्रेस ने उन्हें कोर कमेटी में जगह दी है। साथ ही सोनी सोढ़ी की राहुल गांधी से मुलाकात और उनके भाई को टिकट देने की चर्चा भी राजनैतिक गलियारों में चल रही है। दूसरी ओर अमरजीत भगत भी कांग्रेस के पास एक आदिवासी चेहरा हैं।

रामदयाल उइके का पार्टी छोड़ना किस मजबूरी या फायदे के लिए हुआ? क्या भाजपा जिसमें नंदकुमार साय जैसे क़द्दावर आदिवासी नेता किनारे लगा दिए गए उसमें उन्हें आदिवासी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया जाएगा? उन्हें वो सम्मान मिल पाएगा? अगर उइके भाजपा में जा रहे थे तो जोगी से पूछ कर क्यों गए? अगर जोगी के दावे में सच्चाई है तो फिर क्या जोगी और भाजपा में सांठगांठ का कांग्रेस का आरोप सही है? हालांकि ये भविष्य के गर्भ में छिपा है। समय आने पर हमें पता चलेगा। रही बात कांग्रेस की तो कांग्रेस उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर सम्मान दे ही रही थी और सरकार आने पर वरिष्ठ आदिवासी विधायक होने के नाते उन्हें उपकृत भी किया जाता। फिर उनके जाने के पीछे कोई तर्कसंगत बात भी वह नहीं बता पा रहे हैं। जो राज़ है, वो तो राज़ रहेगा, पर यह तो स्पष्ट कहा जा सकता है कि कांग्रेस आदिवासी नेतृत्व के संकट से गुज़र रही है।

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