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सीएम हेल्पलाइन में ‘समाधान’ का खेल? जांच के आदेश के अगले ही दिन शिकायत निराकृत होने पर उठे गंभीर सवाल…

बिलासपुर डीईओ कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल, शिकायतकर्ता का आरोप—जांच पूरी हुए बिना ही कर दिया गया निराकरण

बिलासपुर। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 का उद्देश्य आम लोगों की शिकायतों को जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचाकर उनका समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से समाधान कराना है। लेकिन बिलासपुर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से जुड़ा एक मामला अब इसी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि एक निजी स्कूल से संबंधित शिकायत पर जांच के आदेश के महज एक दिन बाद ही उसे निराकृत बता दिया गया, जबकि शिकायत में उठाए गए बिंदुओं की वास्तविक जांच और शिकायतकर्ता को संतोषजनक जवाब दिए जाने को लेकर सवाल बने हुए हैं।

मामला राजकिशोर नगर-मोपका स्थित सीता देवी पब्लिक स्कूल से जुड़ा बताया जा रहा है। शिकायतकर्ता के रिश्ते का एक बच्चा इस स्कूल में अध्ययनरत है। पालक की ओर से उसके रिश्तेदार अधिवक्ता ने स्कूल की कथित अनियमितताओं और नियमों के पालन से जुड़े मुद्दों को लेकर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 पर शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का कहना है कि उसने यह उम्मीद की थी कि मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के माध्यम से मामले की निष्पक्ष जांच होगी और संबंधित विभाग द्वारा नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

लेकिन शिकायत के बाद जिस तेजी से उसका कथित निराकरण दर्ज किया गया, उसी ने पूरे मामले को सवालों के घेरे में ला दिया है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, पहले मामले में जांच के आदेश दिए गए और इसके बाद महज 24 घंटे के भीतर ही शिकायत का निराकरण दर्ज कर दिया गया। अब सवाल यह है कि जिस शिकायत में स्कूल की कार्यप्रणाली और नियमों के पालन से जुड़े गंभीर बिंदु उठाए गए थे, उनकी जांच इतनी कम अवधि में कैसे पूरी हो गई? क्या संबंधित दस्तावेजों की जांच की गई? क्या स्कूल प्रबंधन का पक्ष लिया गया? क्या शिकायतकर्ता या पालक को जांच के निष्कर्ष से अवगत कराया गया? और सबसे अहम—यदि जांच के आदेश के अगले ही दिन शिकायत का निराकरण कर दिया गया, तो जांच की प्रक्रिया वास्तव में कितनी विस्तृत थी?

जांच हुई या सिर्फ कागजों में निपट गया मामला?

शिकायतकर्ता ने डीईओ कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि विभागीय स्तर पर शिकायतों के निराकरण की प्रक्रिया महज औपचारिकता बनकर रह गई है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि शिकायतों के निराकरण की गुणवत्ता केवल पोर्टल पर ‘निराकृत’ दर्ज करने से तय नहीं होती। शिकायत के प्रत्येक बिंदु की जांच, संबंधित पक्षों का पक्ष, दस्तावेजों का परीक्षण और शिकायतकर्ता को स्पष्ट निष्कर्ष उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन जैसी व्यवस्था में यदि किसी शिकायत को बिना पर्याप्त जांच के जल्दबाजी में बंद करने का आरोप सही साबित होता है, तो इससे शिकायत निवारण प्रणाली की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।

निजी स्कूलों पर विभागीय निगरानी भी सवालों के घेरे में

यह पूरा मामला निजी स्कूलों में नियमों के पालन और जिला शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। स्कूलों से जुड़ी शिकायतों में फीस, प्रवेश, मान्यता, विद्यार्थियों के हित, दस्तावेज, शिक्षण व्यवस्था और अन्य नियामकीय पहलुओं की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं होती हैं। ऐसे में शिकायतकर्ता द्वारा उठाए गए प्रत्येक बिंदु का रिकॉर्ड के आधार पर परीक्षण होना जरूरी है।

मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या संबंधित स्कूल के दस्तावेज और विभागीय रिकॉर्ड खंगाले गए या नहीं। यदि जांच की गई तो उसका निष्कर्ष क्या था और शिकायतकर्ता को उसकी जानकारी किस रूप में दी गई?

‘निराकरण’ से ज्यादा जरूरी है संतुष्टि और पारदर्शिता

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर किसी शिकायत को ‘निराकृत’ दर्ज कर देना प्रशासनिक प्रक्रिया का अंतिम चरण माना जा सकता है, लेकिन वास्तविक सवाल यह है कि शिकायत का समाधान हुआ भी या नहीं। यदि शिकायतकर्ता अब भी उन्हीं सवालों के जवाब तलाश रहा है जिनको लेकर उसने शिकायत की थी, तो सिर्फ पोर्टल पर शिकायत बंद कर देना अपने आप में समाधान नहीं माना जा सकता।

इस मामले में शिकायतकर्ता ने अब पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। साथ ही यह भी सवाल सामने है कि मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में दर्ज शिकायत की जांच किस अधिकारी ने की, जांच के लिए क्या समय दिया गया, किन दस्तावेजों का परीक्षण हुआ और किस आधार पर शिकायत को निराकृत किया गया।

अब निगाह इस बात पर है कि क्या संबंधित उच्च अधिकारी इस मामले में शिकायत के वास्तविक निराकरण की जांच कराएंगे या फिर ‘निराकृत’ की ऑनलाइन एंट्री को ही अंतिम सत्य मान लिया जाएगा।

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