बिलासपुर/रतनपुर। आधुनिक दौर में जब समाज समानता, भाईचारे और कानून के राज की बात करता है, वहीं बिलासपुर जिले के रतनपुर थाना क्षेत्र के ग्राम नवागांव (पोड़ी-मोहदा) से सामने आया एक कथित मामला सामाजिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि नवधा रामायण के आयोजन के लिए चंदा नहीं दे पाने पर 57 वर्षीय बीमार और निसंतान संतोष साहू तथा उनके परिवार का कथित तौर पर गांव वालों ने बहिष्कार कर दिया गया। पीड़ित का आरोप है कि गांव में उनका हुक्का-पानी बंद करने के साथ ही बातचीत, खेती-किसानी, मजदूरी और अधिया-ठेका तक पर रोक लगा दी गई।
संतोष साहू का कहना है कि वर्ष 2023 में गांव में नवधा रामायण आयोजन के लिए कुछ लोग चंदा मांगने उनके घर पहुंचे थे। आर्थिक स्थिति बेहद खराब होने और स्वयं तथा पत्नी के बीमार होने के कारण वह चंदा देने में असमर्थ थे। पीड़ित के मुताबिक इसी बात से नाराज होकर गांव के कुछ प्रभावशाली लोगों ने 25 मई 2023 को बैठक बुलाई और उनके परिवार के खिलाफ कथित रूप से प्रतिबंध लगाने का फैसला किया।
शिकायत के अनुसार इसके बाद संतोष साहू और उनके परिवार से बातचीत करने, सामाजिक संबंध रखने, खेती-किसानी और मजदूरी करने तथा अधिया-ठेका लेने तक पर कथित रोक लगा दी गई। आरोप तो यहां तक है कि यदि कोई व्यक्ति पीड़ित परिवार से बातचीत करता या उनकी मदद करता तो उस पर 2,500 रुपये का कथित अर्थदंड लगाया जाता।
पीड़ित ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि गांव के अश्वनी साहू, भगवानी साहू और लाला केवट पर भी उनसे बातचीत अथवा उनका साथ देने के कारण कथित तौर पर जुर्माना लगाया गया। संतोष साहू के घर रहकर मिस्त्री का काम करने वाले चैतराम साहू को भी कथित रूप से गांव में दूसरे लोगों के घर काम करने से रोकने का दबाव बनाया गया।
मामला यहीं नहीं रुका। संतोष साहू का आरोप है कि उनके खेत को अधिया में लेकर जुताई करने वाले किसान राजेश श्याम को भी गांव के लोगों ने कथित तौर पर डराया-धमकाया और खेत में काम करने से रोक दिया। इससे पीड़ित के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया।
57 वर्षीय संतोष साहू निसंतान हैं और उनके मुताबिक उनकी देखभाल करने वाला कोई दूसरा सहारा भी नहीं है। वह और उनकी पत्नी बीमारी से जूझ रहे हैं। ऐसे में खेती और मजदूरी जैसे सीमित साधनों पर कथित रोक ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है।
पीड़ित ने यह भी आरोप लगाया है कि साहू समाज के नाम से बनाए गए एक व्हाट्सएप ग्रुप में उनके खिलाफ लगातार अपमानजनक संदेश पोस्ट किए जा रहे हैं। लंबे समय से चल रहे कथित सामाजिक बहिष्कार और मानसिक प्रताड़ना से परेशान संतोष साहू ने अपने आवेदन में यहां तक लिखा है कि उनके सामने आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
यह बात प्रशासन और पुलिस के लिए बेहद गंभीर चेतावनी है। यदि कोई व्यक्ति शिकायत में लगाए गए आरोपों के मुताबिक सामाजिक दबाव, आर्थिक बहिष्कार और मानसिक प्रताड़ना से इस हद तक टूट चुका है कि वह आत्महत्या की बात करने लगे, तो मामले को सामान्य विवाद मानकर टालना गंभीर चूक साबित हो सकती है।
संतोष साहू के अनुसार उन्होंने 29 जून 2026 को रतनपुर थाने में शिकायत की थी। इसके बाद कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए उन्होंने 13 जुलाई 2026 को पुलिस अधीक्षक बिलासपुर और 28 जुलाई 2026 को कलेक्टर बिलासपुर के जनदर्शन में आवेदन देकर पूरे मामले की शिकायत की।
पीड़ित ने सामाजिक बहिष्कार और कथित प्रताड़ना के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कर कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर किसी धार्मिक आयोजन के लिए चंदा नहीं दे पाना किसी व्यक्ति के सामाजिक और आर्थिक अधिकार छीनने का आधार कैसे बन सकता है? क्या किसी परिवार की आर्थिक मजबूरी की कीमत उसका सामाजिक बहिष्कार हो सकती है? क्या गांव में कोई कथित सामूहिक फरमान कानून से ऊपर हो सकता है?
यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला महज दो पक्षों के विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह सामाजिक बहिष्कार, कथित दबाव, आजीविका में हस्तक्षेप और मानसिक प्रताड़ना जैसे गंभीर पहलुओं से जुड़ जाएगा।
अब पूरे मामले में पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर निगाहें टिकी हैं। जरूरत इस बात की है कि शिकायत की निष्पक्ष जांच हो, पीड़ित परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के मुताबिक कठोर कार्रवाई हो।
क्योंकि लोकतंत्र और कानून के राज में किसी भी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए सामाजिक रूप से खत्म करने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता कि उसने अपनी आर्थिक मजबूरी के चलते किसी आयोजन के लिए चंदा देने में असमर्थता जताई।


