बिलासपुर। शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले विद्यालयों में शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व, संस्कार और भविष्य की नींव भी तैयार करते हैं। लेकिन जब किसी शिक्षक की कार्यशैली ही सवालों के घेरे में आ जाए, सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने की कथित होड़ विद्यालय की गरिमा से टकराने लगे और विद्यार्थियों से ही लाइक-फॉलो कराने के आरोप सामने आने लगें, तो यह मामला केवल व्यक्तिगत आचरण तक सीमित नहीं रहता। यह शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही और विद्यार्थियों के हितों से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।
बिलासपुर के सरकंडा स्थित स्वामी आत्मानंद शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय को लेकर सामने आए आरोपों ने इसी तरह के कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक शिक्षिका की सोशल मीडिया गतिविधियों, विद्यालय में मोबाइल फोन के कथित इस्तेमाल और विद्यार्थियों से रील्स को लाइक तथा फॉलो करने के लिए कहे जाने की शिकायतों को लेकर अब शिक्षा विभाग और विद्यालय प्रबंधन की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
प्राप्त जानकारी और लगाए गए आरोपों के अनुसार, संबंधित शिक्षिका की एक रील कुछ माह पहले भी सोशल मीडिया पर चर्चा में आई थी। आरोप है कि इस वीडियो में वे सकरी बायपास के पास एक कार के ऊपर स्टंट करती दिखाई दी थीं और उनके हाथ में शराब की बोतल जैसी वस्तु नजर आ रही थी। यह भी दावा किया गया है कि वीडियो के आधार पर पुलिस ने वाहन नंबर के जरिए संबंधित लोगों की पहचान की और कार्रवाई करते हुए शिक्षिका को गिरफ्तार किया था।
हालांकि, इस पूर्व प्रकरण में गिरफ्तारी, दर्ज अपराध की धाराओं और वर्तमान कानूनी स्थिति की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। यदि इस मामले में कार्रवाई हुई थी, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिक्षा विभाग ने अपने स्तर पर क्या कदम उठाए? क्या संबंधित शिक्षिका से स्पष्टीकरण मांगा गया? क्या मामले की विभागीय जांच कराई गई? और क्या विद्यालय प्रबंधन ने उच्चाधिकारियों को इसकी जानकारी दी?
यदि ऐसी किसी घटना की जानकारी होने के बावजूद विभागीय स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो इसकी वजह स्पष्ट होनी चाहिए। सरकारी विद्यालयों में कार्यरत कर्मचारियों के आचरण से जुड़े मामलों में नियमों के अनुसार निष्पक्ष समीक्षा और आवश्यक कार्रवाई की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की होती है।

इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक आरोप यह है कि संबंधित शिक्षिका कथित तौर पर विद्यार्थियों से अपने सोशल मीडिया अकाउंट को लाइक और फॉलो करने के लिए कहती हैं, ताकि उनकी रील्स की पहुंच और लोकप्रियता बढ़ सके। यदि यह आरोप सही पाया जाता है, तो यह केवल सोशल मीडिया के निजी इस्तेमाल का विषय नहीं रहेगा, बल्कि शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों में पेशेवर मर्यादा, विद्यार्थियों की स्वतंत्रता और विद्यालय के शैक्षणिक वातावरण से जुड़ा प्रश्न बन जाएगा।
विद्यार्थी विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने आते हैं, किसी कर्मचारी के निजी सोशल मीडिया अकाउंट की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए नहीं। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच स्वाभाविक रूप से अधिकार और विश्वास का संबंध होता है। ऐसे में बच्चों से किसी निजी सोशल मीडिया गतिविधि में भाग लेने के लिए कहना, विशेषकर यदि उसमें दबाव या शैक्षणिक प्रभाव का भय जुड़ा हो, गंभीरता से जांचे जाने योग्य है।
सवाल यह भी है कि क्या विद्यार्थियों को अपनी इच्छा से सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता दी जा रही है, या वे शिक्षक के पद और प्रभाव के कारण ऐसा करने के लिए बाध्य महसूस करते हैं? यदि शिकायत करने वाले विद्यार्थियों ने वास्तव में इस संबंध में आपत्ति जताई है, तो विद्यालय प्रबंधन को उनकी बात गोपनीयता और संवेदनशीलता के साथ सुननी चाहिए।
शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया है कि संबंधित शिक्षिका की कुछ सोशल मीडिया रील्स की भाषा, प्रस्तुति या सामग्री विद्यालय के शिक्षक पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है। सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की निजी गतिविधि और उसके पेशेवर दायित्वों के बीच अंतर जरूर है, लेकिन जब किसी सरकारी शिक्षक के आचरण को लेकर औपचारिक शिकायत सामने आती है, तो तथ्यों की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।
किसी वायरल वीडियो या सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर सीधे दोष तय करना उचित नहीं होगा। लेकिन शिकायतों को नजरअंदाज करना भी समाधान नहीं है। संबंधित वीडियो, उनकी वास्तविकता, संदर्भ और विद्यार्थियों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव की जांच कर विभाग को स्पष्ट स्थिति सामने रखनी चाहिए।
मामले का एक दूसरा पहलू विद्यालय परिसर में मोबाइल फोन के इस्तेमाल से जुड़ा है। आरोप है कि विद्यालय में मोबाइल लाने पर प्रतिबंध या नियंत्रण होने के बावजूद कुछ विद्यार्थी नियमित रूप से मोबाइल लेकर पहुंचते हैं। शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि इस स्थिति पर विद्यालय प्रशासन प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पा रहा है।
यहां सवाल किसी एक विद्यार्थी के मोबाइल रखने तक सीमित नहीं है। यदि विद्यालय में मोबाइल फोन के इस्तेमाल को लेकर नियम लागू हैं, तो उनका पालन सभी के लिए समान रूप से होना चाहिए। यदि नियम नहीं हैं या उनमें किसी प्रकार की छूट है, तो विद्यालय प्रबंधन को उसकी स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।
सबसे अहम बात यह है कि विद्यालय परिसर में मोबाइल का इस्तेमाल पढ़ाई, अनुशासन और विद्यार्थियों की निजता को प्रभावित तो नहीं कर रहा? क्या विद्यार्थियों के समय और ध्यान का उपयोग शैक्षणिक गतिविधियों के बजाय सोशल मीडिया की लोकप्रियता बढ़ाने में हो रहा है? इन प्रश्नों का जवाब अनुमान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच से सामने आना चाहिए।
शिकायत में विद्यालय के प्राचार्य की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि विद्यार्थियों ने इस विषय में अन्य शिक्षकों और प्राचार्य तक अपनी आपत्ति पहुंचाई, लेकिन इसके बाद भी प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं दी।
यदि विद्यार्थियों ने लिखित या मौखिक रूप से ऐसी शिकायत की थी, तो प्राचार्य ने उस पर क्या कार्रवाई की? क्या शिकायत को दर्ज किया गया? क्या संबंधित शिक्षिका से जवाब मांगा गया? क्या जिला शिक्षा अधिकारी या अन्य सक्षम अधिकारी को जानकारी भेजी गई? और यदि कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई थी, तो विद्यालय प्रबंधन का इस पूरे विवाद पर क्या पक्ष है?
इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है। प्राचार्य का दायित्व केवल विद्यालय का प्रशासनिक संचालन करना नहीं, बल्कि शैक्षणिक अनुशासन बनाए रखना और विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करना भी है। यदि शिकायतों की अनदेखी हुई है, तो उसकी भी जांच होनी चाहिए। वहीं, यदि प्राचार्य ने नियमानुसार कार्रवाई की है, तो उसका विवरण सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
इस प्रकरण में जिला शिक्षा अधिकारी और संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। विभाग को चाहिए कि वह सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री, पूर्व विवाद से संबंधित दस्तावेजों, विद्यार्थियों की शिकायतों और विद्यालय प्रबंधन के जवाब की स्वतंत्र रूप से जांच कराए।
जांच के दौरान विद्यार्थियों पर किसी तरह का दबाव न पड़े, उनकी पहचान अनावश्यक रूप से सार्वजनिक न हो और संबंधित शिक्षिका को भी अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिले। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो लागू सेवा नियमों और विभागीय प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
आज सोशल मीडिया जीवन का हिस्सा बन चुका है। शिक्षक भी अन्य नागरिकों की तरह निजी जीवन में सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन किसी भी पेशे में जिम्मेदारी, कार्यस्थल की मर्यादा और अपने दायित्वों के प्रति जवाबदेही महत्वपूर्ण होती है। शिक्षण जैसे संवेदनशील पेशे में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, क्योंकि शिक्षक का व्यवहार विद्यार्थियों पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है।
यह मामला किसी व्यक्ति को सोशल मीडिया पर बदनाम करने या बिना जांच दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि उन सवालों के जवाब मांगने का है जो विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंता से जुड़े हैं। यदि बच्चों को निजी सोशल मीडिया अकाउंट की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जाने की शिकायत सही है, तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
अब निगाहें शिक्षा विभाग पर हैं। क्या विभाग शिकायतों को गंभीरता से लेकर निष्पक्ष जांच कराएगा? क्या विद्यालय प्रबंधन अपनी भूमिका स्पष्ट करेगा? और क्या विद्यार्थियों को यह भरोसा मिल सकेगा कि उनकी पढ़ाई, गरिमा और हित किसी भी व्यक्ति की निजी सोशल मीडिया गतिविधियों से ऊपर हैं?
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