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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: न पहली पत्नी को मिला वैध पत्नी का दर्जा, न दूसरी को; दिवंगत सरकारी कर्मचारी की संपत्ति…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दिवंगत सरकारी कर्मचारी सुखीदास कुर्रे की संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद में ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने वैवाहिक संबंधों की कानूनी वैधता और संतान के संपत्ति अधिकारों के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित कर दिया है। अदालत ने साफ कर दिया कि सुखीदास की मृत्यु के समय दोनों में से किसी भी महिला को उनकी वैध पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता। हालांकि, दोनों महिलाओं से जन्मे तीनों बच्चों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे और उन्हें पिता की अचल संपत्ति में बराबर हिस्सा मिलेगा।

न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की खंडपीठ ने 13 अक्टूबर को दोनों महिलाओं की याचिकाओं का निराकरण करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले में संशोधन किया। अदालत ने एक ओर वैवाहिक संबंधों की वैधता पर उठे सवालों के आधार पर दोनों महिलाओं को पत्नी के रूप में मान्यता देने से इनकार किया, वहीं दूसरी ओर बच्चों के संपत्ति अधिकारों को उनकी माताओं की वैवाहिक स्थिति से अलग रखते हुए तीनों को समान हिस्सेदारी प्रदान की।

पशु चिकित्सा विभाग में सहायक क्षेत्र अधिकारी के पद पर कार्यरत रहे सुखीदास कुर्रे की मृत्यु 12 अगस्त 2015 को हुई थी। उनके निधन के बाद संपत्ति और सेवा संबंधी लाभों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। पहली पत्नी के रूप में दावा करने वाली शोभा साहू से उनका बेटा अविनाश है, जबकि अशोक लता कुर्रे से उनकी दो बेटियां लक्ष्मी और बेबी उर्फ दीपिका हैं।

विवाद की जड़ में दोनों महिलाओं के पूर्व वैवाहिक संबंध और उनके दस्तावेज थे। अशोक लता और उनकी बेटियों की ओर से दलील दी गई कि शोभा ने 10 जुलाई 2000 को एक सहमतिनामे के माध्यम से सुखीदास से अलग होने की बात स्वीकार की थी। इसके बाद शोभा ने अरुण साहू से विवाह कर लिया था।

दूसरी ओर, शोभा ने पहले विवाह के विधिवत समाप्त होने पर सवाल उठाया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अशोक लता का अपने पहले पति धनेश कोसले से तलाक नहीं हुआ था, इसलिए सुखीदास के साथ उनका विवाह भी कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता।

इस तरह संपत्ति पर अधिकार की लड़ाई में दोनों पक्षों के वैवाहिक इतिहास और दस्तावेजों की भूमिका अहम हो गई।

हाई कोर्ट ने मामले के दस्तावेजों और गवाहियों का परीक्षण करते हुए शोभा के सेवा संबंधी अभिलेखों को महत्वपूर्ण माना। रिकॉर्ड में अरुण साहू का नाम पति के रूप में दर्ज था। सेवा पुस्तिका में अरुण की तस्वीर भी मौजूद थी और उन्हें सेवा लाभों के लिए नामांकित किया गया था।

अदालत ने सहमतिनामे और संबंधित अभिलेखों के प्रभाव पर विचार किया। शोभा यदि सहमतिनामे के आधार पर सुखीदास से अलग होकर अरुण के साथ वैवाहिक संबंध स्वीकार कर चुकी थीं, तो संपत्ति पर दावा करते समय उसी दस्तावेज के प्रभाव से इनकार नहीं कर सकती थीं।

वहीं, अशोक लता ने स्वीकार किया कि उनका पहले पति धनेश कोसले से विवाह विच्छेद नहीं हुआ था। इन तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने दोनों महिलाओं को सुखीदास की मृत्यु के समय उनकी वैध पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया।

इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि जब दोनों महिलाओं को वैध पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा रहा है, तो सुखीदास की संपत्ति का अधिकार किसे मिलेगा? हाई कोर्ट ने इस सवाल पर बच्चों के अधिकारों को केंद्र में रखा।

अदालत ने पाया कि अविनाश, लक्ष्मी और बेबी उर्फ दीपिका, तीनों सुखीदास की संतान हैं और उनकी संतान होने को लेकर पक्षों के बीच विवाद नहीं था। इसलिए माताओं की वैवाहिक स्थिति का विवाद बच्चों के संपत्ति अधिकारों को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता।

हाई कोर्ट ने तीनों बच्चों को सुखीदास की जमीन, मकान सहित अचल संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी देने का निर्णय किया। इसका मतलब है कि किसी एक महिला के दावे के आधार पर पूरी अचल संपत्ति पर अकेले अधिकार नहीं दिया जा सकता। पिता की संपत्ति में तीनों संतानों का समान अधिकार बरकरार रहेगा।

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सुखीदास के वेतन, पेंशन, सामान्य भविष्य निधि (जीपीएफ), उपादान और अन्य सेवा संबंधी लाभों से जुड़ा था। इन मदों में करीब 17 लाख रुपये की राशि को लेकर भी दावेदारी की गई थी।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अचल संपत्ति में अधिकार घोषित हो जाने मात्र से सेवा संबंधी राशि हासिल करने का रास्ता नहीं खुल जाता। ऐसी राशि के भुगतान के लिए नियमानुसार उचित राहत मांगना, आवश्यक न्यायालय शुल्क जमा करना और सक्षम न्यायालय से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्राप्त करना जरूरी होगा।

इसी आधार पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें सेवा संबंधी राशि पर अधिकार घोषित किया गया था। संबंधित पक्ष भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के भाग-दस के तहत सक्षम न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के लिए आवेदन कर सकते हैं। प्रमाणपत्र मिलने के बाद संबंधित विभाग लागू सेवा नियमों के अनुसार भुगतान पर निर्णय लेगा।

सुखीदास कुर्रे की संपत्ति से जुड़ा यह मामला केवल दो महिलाओं के बीच अधिकारों की लड़ाई नहीं था, बल्कि इसमें वैवाहिक संबंधों की कानूनी स्थिति, सरकारी सेवा अभिलेखों की अहमियत और बच्चों के संपत्ति अधिकार जैसे महत्वपूर्ण सवाल भी शामिल थे।

हाई कोर्ट के फैसले ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक संबंधों की वैधता और संतान के संपत्ति अधिकारों को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता। अदालत ने दोनों महिलाओं को वैध पत्नी का दर्जा नहीं दिया, लेकिन तीनों बच्चों को पिता की अचल संपत्ति में समान हिस्सा देकर उनके अधिकारों को अलग आधार पर सुरक्षित रखा।

वहीं, करीब 17 लाख रुपये के सेवा लाभों के मामले में अदालत ने कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य बताया। दोनों अपीलों का निराकरण करते हुए हाई कोर्ट ने संपत्ति और सेवा लाभों के दावों के बीच स्पष्ट अंतर कायम कर दिया।

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